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राम मंदिर : कार सेवकों पर गोलियों की बौछार के बीच रामकृपा से बची थी जान

Fri, 12 Jan 2024 01:01 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 12 Jan 2024 01:01 PM IST
सार

मन में उठा ज्वार श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की तरफ धकेलने लगा, लेकिन ओएनजीसी के भू-वैज्ञानिक के रूप में कर्तव्य आड़े आ रहे थे। भगवान राम के प्रति उपजे समर्पण और सेवा भाव ने अंतत: भूवैज्ञानिक पद से त्यागपत्र दिलवा दिया।

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Ram Mandir: Amidst the shower of bullets on Kar Sevaks, life was saved by the grace of Ram.
राजाराम यादव, कार सेवक, पूर्व कुलपति वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव का उल्लास देखकर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. राजाराम यादव भावुक हो उठते हैं। वह बताते हैं कि 1987 में असम के शिवसागर में वह ओएनजीसी में भूगर्भ वैज्ञानिक के पद पर तैनात थे। उसी समय आरएसएस के शिविर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर संघ चालक बाला साहब देवरस ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का ताला खुलने की जानकारी दी थी। इस समाचार से मन में अलौकिक स्पंदन हुआ और नेत्र सजल हो उठे थे। वह खुशी का ऐसा भाव था जिसे व्यक्त कर पाना कठिन है।

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मन में उठा ज्वार श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की तरफ धकेलने लगा, लेकिन ओएनजीसी के भू-वैज्ञानिक के रूप में कर्तव्य आड़े आ रहे थे। भगवान राम के प्रति उपजे समर्पण और सेवा भाव ने अंतत: भूवैज्ञानिक पद से त्यागपत्र दिलवा दिया। ओएनजीसी ने एक वर्ष बाद त्यागपत्र स्वीकार कर लिया। इसके बाद 1988 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रयाग महानगर प्रचारक का दायित्व मिला। मेरी स्मृति में 1990 का वह विशाल जनसमूह आज भी तैरता है, जब शिला पूजन के लिए लंबा कारवां अयोध्या की ओर चल पड़ा। प्रयाग में लाखों के जन ज्वार का नेतृत्व स्वामी वासुदेवानंद कर रहे थे।

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संघ के प्रचारक के रूप में इस पुनीत कार्य की व्यवस्था का जिम्मा मुझ पर भी था। इस विशाल जनसमूह में फाफामऊ में ही अधिकांश को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन कुछ लोग अयोध्या पहुंचने में सफल रहे। 29 अक्तूबर 1990 को कारसेवकों की विदाई के बाद 31 अक्तूबर 1990 को प्रयाग से सात कार्यकर्ता गावों के मार्ग से अयोध्या कारसेवा के लिए निकल पड़े। 90 किलोमीटर का यह मार्ग हम सबके लिए अपरिचित था, लेकिन राम कृपा से निर्बाध रूप से चलते गए। रास्ते के गांवों में भक्तों ने हमको भगवान राम के सेवक की तरह मानकर सेवा की।
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कारसेवा के याद को किया साझा

31 अक्तूबर को रास्ते में अयोध्या पहुंचे कार सेवकों की ओर से बाबरी ढांचे के गुंबद के ऊपर विजय ध्वज फहराए जाने की सूचना मिली। इस सूचना ने मन में असीम साहस एवं ऊर्जा का संचार किया। नवंबर की पहली तारीख थी, जब हम भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या पहुंच गए। सायंकाल का समय था मणिराम छावनी परिसर में अशोक सिंघल दो नवंबर 1990 को राम जन्मभूमि परिसर घेरने का आह्वान कर रहे थे।

छावनी में एकत्र जनसमूह इतना विशाल था कि गेट से प्रवेश कर पाना संभव नहीं था। इसलिए हम लोग बाउंड्री के सहारे छत पर जाकर आंदोलन के नायक अशोक सिंघल का उद्बोधन सुनने लगे। दो नवंबर को योजनानुसार हनुमान गढ़ी वाले मुख्य मोर्चे में कारसेवा के लिए हम लोग आगे बढ़ गए। हम लोग मुख्य सड़क पर प्रवेश करने ही वाले थे कि छतों के ऊपर से गोलियों की बौछार होने लगी।

प्रभु श्रीराम को मुझसे कुछ और भी कार्य करवाना था, ऐसे में दैवीय संयोगवश मैं बच गया। कारसेवकों के संकल्प एवं धैर्य में कोई कमी नहीं आई। करीब घंटे भर बाद परमहंस महंत रामचंद्रदास महाराज की जीप आई और शहीद कोठारी बंधुओं के शवों सहित घायल कार सेवकों को ले गई। इसके बाद हम धीरे-धीरे पुलिस से बचते हुए छिपते हुए कारसेवकपुरम पहुंच गए। तीन नवंबर को सरकार से हुए समझौते के अनुसार हम लोगों को रोडवेज की बसों से प्रयागराज भेज दिया गया।
 

 

रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान कारसेवा का यह अनुभव स्मृति पटल पर अब भी अंकित है। इसपर समय की धूल नहीं जम पाई है। कारसेवकों का त्याग बलिदान ताजा है। संपूर्ण देश से आए कारसेवक मित्रों की याद आती रहती हैं। मन बेहद प्रसन्न है कि गुलामी के प्रतीक बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुशल नीति के परिणामस्वरूप रामलला भव्य मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। - प्रो. राजाराम यादव,कार सेवक, पूर्व कुलपति वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल यूनिवर्सिटी जौनपुर।

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