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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   Bithoor still preserves the memories of Ramayana period, Ram, Mother Sita and Luvkush have a special bond

Ram Mandir: बिठूर आज भी सहेजे है रामायण काल की यादें, कण-कण में बसते हैं राम, मां सीता और लवकुश का भी है नाता

Fri, 19 Jan 2024 01:01 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Fri, 19 Jan 2024 01:01 PM IST
सार

Kanpur News: बिठूर में कदम-कदम पर प्रभु श्रीराम की निशानियां अब भी जीवंत हैं। माता सीता, लव-कुश और महर्षि वाल्मीकि से जुड़े स्थल हर किसी को अपनी ओर खींचते हैं। मान्यताओं के आधार पर हम आपको कुछ विशेष स्थानों के बारे में बता रहे हैं, जो भगवान राम के जीवनकाल से जुड़े है।

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Bithoor still preserves the memories of Ramayana period, Ram, Mother Sita and Luvkush have a special bond
बिठूर स्थित वाल्मीकि आश्रम और सीता पाताल प्रवेश कुंड - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कानपुर में तीर्थ नगरी बिठूर आज भी रामायण काल की यादें समेटे हुए है। यहां रामायण काल की गाथा बताने वाला लव कुश की जन्मभूमि वाल्मीकि आश्रम के अलावा भरत घाट और लक्ष्मण घाट भी है, जो बिठूर और भगवान राम के जीवन से जुड़े अनेक पहलुओं को दर्शाता है। कहा जाता है कि 14 वर्षों के बनवास के बाद भरत ने पिता दशरथ की अस्थियां भी यहां की गंगा में विसर्जित की थी। मान्यताओं के आधार पर ये है कुछ विशेष स्थान जो बिठूर और भगवान राम के जीवनकाल से जुड़े है।

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वाल्मीकि आश्रम
बिठूर चुंगी से जाने वाले रास्ते पर मात्र 100 मीटर की दूरी पर वाल्मीकि आश्रम स्थित है। मान्यता है कि जब भगवान राम ने सीता माता का त्याग किया तब लक्ष्मण माता सीता को परियर उन्नाव के जंगलों में छोड़ गए थे। जहां से महर्षि वाल्मीकि सीता को अपने आश्रम ले आये थे। इसी आश्रम में महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की देवलिप भाषा में रचना की थी। इस आश्रम का जीर्णोद्धार 19वीं शताब्दी में बाजीराव पेशवा द्वितीय ने करवाया था। तब से यह आश्रम पूज्यनीय स्थल के रूप में मान्य है।

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सीता पाताल कुंड
वाल्मीकि आश्रम के पास ही सीता पाताल कुंड है। कहा जाता है कि इसी कुंड में माता सीता हमेशा के लिए धरती में समा गई थीं। आज भी लोग इस कुंड में दान पुण्य के रूप सिक्के डालते है।

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पीलू का वृक्ष जहां मां सीता करती थी पूजा
वाल्मीकि आश्रम के पास ही पीलू का अति प्राचीन वृक्ष है। मान्यता है कि आश्रम में निवास के दौरान माता सीता इसी पीलू के वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा अर्चना किया करती थी। मान्यता है कि तब से लेकर आज तक इस पेड़ पर कभी पतझड़ नही आया है। इसकी पत्तियां हमेशा बरकरार रही हैं।

लव कुश जन्म स्थली
वाल्मीकि आश्रम से 20 कदम की दूरी पर ही लव और कुश की जन्मस्थली है जहां मान्यता है जहां माता सीता के दो पुत्र लव और कुश हुए थे।पास में ही उनकी शिक्षा दीक्षा हुई थी।

रामायण काल के बाण
ब्रह्मवर्त घाट पर बने श्री रामजानकी मंदिर में लवकुश के तीर और बाण रखे हुए हुए। लव और कुश के इस बाण का इस्तेमाल प्रभु राम की सेना से युद्ध के दौरान किये थे। ये बाण आज भी इसी मंदिर में आने श्रद्धालुओं के मन में भगवान राम के प्रति आस्था को बढ़ाते है।

जब हनुमान जी को पेड़ से बांध दिया था लव कुश ने
वाल्मीकि आश्रम के पास जहां पर फव्वारा बना हुआ है, उसी स्थान पर रामायण काल में लव और कुश ने एक पेड़ से हनुमान जी को रस्सी में लपेटकर बंधक बना लिया था। वर्तमान में इस स्थान पर लवकुश और हनुमानजी जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं।

लक्ष्मण घाट जहां भगवान लक्ष्मण ने किया था स्नान
मान्यता है कि जब लक्ष्मण सीता को उन्नाव परियर के वन क्षेत्र में छोड़ गए थे, तब उन्हें किसी स्त्री को वन में छोड़ने का दोष लगा था। इस पर इस दोष के निवारण के लिए उन्होंने ब्रह्मावर्त बिठूर में गंगा किनारे स्नान किया था। तब जाकर वह इस दोष से मुक्त हुए थे। आज भी लोग यहां के लक्ष्मण घाट पर स्नान करके खुद को दोषमुक्ति होने की कामना करते हैं।

इसी खूंटे में लवकुश ने बांध लिया था अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को
बिठूर ब्रह्मवर्त घाट के पास ही बने चिपड़ेश्वर मंदिर में शिवलिंग के पास एक पत्थर की खूटेनुमा आकृति है। कहा जाता है कि यह वही खूंटा है जिसमें लवकुश ने भगवान राम द्वारा छोड़े गए अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को पकड़कर बांध दिया था।

सीता रसोई जहां सीता बनाती थी भोजन
वाल्मीकि आश्रम में ही सीता रसोई है। मान्यता है कि इस आश्रम में निवास के दौरान माता सीता स्वयं भोजन तैयार करती थी। इस रसोई घर में कुछ प्रतीकात्मक बर्तन रखे गए हैं।

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