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Ram Mandir: 'मेरे राम रिश्ते बनाते भी हैं, निभाते भी; वो प्रेम और मर्यादा के संगम हैं...कभी न लांघते मर्यादा'
Thu, 18 Jan 2024 10:25 AM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 18 Jan 2024 10:25 AM IST
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एम्स के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया
- फोटो : अमर उजाला
स्वास्थ्य के क्षेत्र से होने के नाते मैं यकीनन कह सकता हूं कि समाज आज जबरदस्त तनाव में है। अवसाद हर दिन, हर तरफ पांव पसार रहा है, कोई नहीं बचा इससे। इसमें बच्चे भी हैं, बड़े व बुजुर्ग भी। घर में ही एक-दूसरे के दुश्मन बन बैठे हैं। छोटे-छोटे बच्चे तक नहीं बचे हैं इससे। कई मामलों में वह हिंसक तक हुए हैं।
अपने तर्जुबे के आधार पर कह सकता हूं कि इसकी बुनियाद में परिवारों का बिखरना और रिश्तों का तार-तार होना है। मेरे लिए राम का चरित्र यहीं अहम हो जाता है। वह हर पग पर नए रिश्ते बनाते हैं। बने-बनाए रिश्तों को बखूबी निभाते भी हैं। इसी रूप में राम मेरे सबसे नजदीक हैं। राज मिलने पर राम न खुश होते हैं, न वन गमन पर आक्रोशित।
राम होने का मतलब ही है कि सहजता से प्रतिकूल बदलावों को भी स्वीकार कर लें। वनवास मिलने पर भी व्यवहार में बदलाव न आना रामत्व है और रावण को शिकस्त देने का श्रेय खुद न लेना भी।
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प्रिय मुझे तुलसी के राम हैं, जो शौर्य को भी धारण करते हैं, धैर्य को भी। फिर भी स्वभाव पर भारी कोमलता, सहृदयता और शरणागत वत्सलता ही है। राम प्रेम और मर्यादा के संगम हैं। वह कभी भी मर्यादा नहीं लांघते। युद्ध भूमि भी इसका अपवाद नहीं, किसी को कष्ट नहीं देते।
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अपने तर्जुबे के आधार पर कह सकता हूं कि इसकी बुनियाद में परिवारों का बिखरना और रिश्तों का तार-तार होना है। मेरे लिए राम का चरित्र यहीं अहम हो जाता है। वह हर पग पर नए रिश्ते बनाते हैं। बने-बनाए रिश्तों को बखूबी निभाते भी हैं। इसी रूप में राम मेरे सबसे नजदीक हैं। राज मिलने पर राम न खुश होते हैं, न वन गमन पर आक्रोशित।
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राम होने का मतलब ही है कि सहजता से प्रतिकूल बदलावों को भी स्वीकार कर लें। वनवास मिलने पर भी व्यवहार में बदलाव न आना रामत्व है और रावण को शिकस्त देने का श्रेय खुद न लेना भी।
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प्रिय मुझे तुलसी के राम हैं, जो शौर्य को भी धारण करते हैं, धैर्य को भी। फिर भी स्वभाव पर भारी कोमलता, सहृदयता और शरणागत वत्सलता ही है। राम प्रेम और मर्यादा के संगम हैं। वह कभी भी मर्यादा नहीं लांघते। युद्ध भूमि भी इसका अपवाद नहीं, किसी को कष्ट नहीं देते।
बड़ों और छोटों को तो सम्मान देते ही हैं, दुश्मन से भी घृणा नहीं करते। विजित कर किष्किंधा सुग्रीव को दे देते हैं, लंका विभीषण को। दोनों क्षेत्र अपने अधिकार में नहीं लेते। पूरी दुनिया में ऐसा उदाहरण शायद ही मिले। भारत भूमि पर हुई यह बड़ी क्रांति है और आज की दुनिया के लिए सबक भी। -(एम्स के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया से बातचीत पर आधारित)