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कनफ्यूजन में नहीं अक्खड़ और फक्कड़ काशी
राजेन्द्र सिंह, वाराणसी
Updated Fri, 10 Mar 2017 09:29 AM IST
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- फोटो : OnlinePrasad.com
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काशी अक्खड़ भी है और फक्कड़ भी। इसलिए बाबा विश्वनाथ और ज्ञान की नगरी कभी कनफ्यूजन में नहीं रहती। काशी की सबसे खास बात यह है कि यहां का सबसे गया गुजरा समझा जाने वाला आदमी भी बेबाकी से राय रखता है। दरअसल, संसार के प्राचीनतम शहरों में शुमार मंदिरों की यह नगरी कुछ अलग ढंग से सोचती है। यहां दो लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है लेकिन वे उलझन में कभी नहीं रहते। हार-जीत किसी की हो लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर काशी में कोई कनफ्यूजन नहीं दिखता है।
काशी, प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है तो पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जन्मभूमि। काशी ने देश व दुनिया को दर्शन, लेखन, संगीत में तमाम मनीषी दिए हैं तो राजनीति में भी हमेशा अहम भूमिका निभाई है। माना जाता है कि तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना भी काशी की पवित्र माटी पर गंगा की गोद में बैठकर की थी। कबीर, रविदास, स्वामी रामानंद से लेकर मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रविशंकर, गिरजा देवी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और हरि प्रसाद चौरसिया समेत न जाने कितने नाम हैं, जिन्होंने काशी में साधना कर देश, दुनिया में अलग पहचान बनाई। यहां के लोग किसी के नाम से नहीं बल्कि भोलेपन, सादगी, नम्रता से ज्यादा रीझते हैं। रीझें भी क्यों नहीं, यह भोले की नगरी जो है।
आजकल वाराणसी के लोग चुनावी गुणा-भाग में ज्यादा मशगूल हैं। कहीं मोदी का गुणगान है तो कहीं उनकी आलोचना करते लोग। कहीं भाजपा उम्मीदवार के संकट में होने तो कहीं उनकी बड़ी जीत के दावे। बाहरी लोग चर्चा में शामिल होते हैं तो काशी के लोग यह बताना नहीं भूलते कि काशी कुछ अलग ढंग से सोचती है।
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काशी ने मोदी को सड़कों पर उतारा
दशाश्वमेध रोड, गोदौलिया, मैदागिन, चौक, लहुराबीर हो या चौक, हर जगह चर्चा चुनाव की है। लोग कहते हैं कि पहले 6 चरणों में मोदी ने हर चरण में तीन-तीन रैलियां की लेकिन सबसे कम सीट होने के बावजूद सातवें चरण में उन्होंने 5 रैलियां, एक सम्मेलन और तीन रोड शो किए। मंदिरों, आश्रमों में गए सो अलग। लोकसभा चुनाव में जहां आने भर से मोदी को बड़ी जीत मिल गई थी, उसी काशी में उन्हें अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए तीन दिन बिताने पड़े।
खूब हुई प्रतीकों की राजनीति
मोदी को प्रतीकों, भावनात्मक मुद्दों के जरिये लोगों से कनेक्ट करने में महारत हासिल है। काशी में उन्होंने प्रतीकों के जरिये खूब राजनीति की। ‘बाबा’ और ‘काशी के कोतवाल’ के दरबार में दस्तक दी। ये विश्व प्रसिद्ध मंदिर वाराणसी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में पड़ते हैं। यह वही सीट है, जहां भाजपा ने सात बार के विधायक श्याम देव चौधरी (दादा) का टिकट काटकर नीलकंठ तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। बाबा विश्वनाथ के दरबार में मोदी जब दादा का हाथ पकड़कर गए तो इसके मायने थे। इससे दादा की नाराजगी कम जरूर हुई है। वह भाजपा के लिए वोट तो मांग रहे हैं मगर प्रत्याशी नीकलंठ का नाम नहीं ले रहे। वहीं, गढ़वाघाट आश्रम जाकर मोदी ने यदुवंशियों व उनके अन्य अनुयायियों को लुभाने की कोशिश की। लाल बहादुर शास्त्री के पैतृक आवास पर उन्हें श्रद्धांजलि देने गए तो इसके पीछे मंशा चुनावी माहौल में कायस्थों को जोड़ने की रही। प्रतीकात्मक राजनीति में राहुल और अखिलेश भी पीछे नहीं रहे। काशी की जंग में जीत का आशीर्वाद लेने के लिए वह भी बाबा विश्वनाथ की शरण में गए।
बाबा की धरती पर सभी की परीक्षा
बाबा विश्वनाथ की धरती सभी दलों की परीक्षा ले रही है। दशाश्वमेध रोड पर चाय की चुस्की के साथ विजय प्रताप सिंह कहते हैं कि मोदी का यहां तीन दिन रहना बता रहा है कि काशी की फिजा बदली हुई है। वह कहते हैं, काशी के बारे में कोई अपनी सोच नहीं बदलता तो काशी उसे बदल देती है। वह कहते हैं कि उम्मीदवारों के चयन में अमित शाह काशी की भावना को नहीं समझ पाए। यही वजह है कि मोदी को तीन दिन में 30-32 घंटे सड़कों पर रहना पड़ा। काशी को समझने में भूल भाजपा को भारी पड़ सकती है। फगुनहटा भरे अंदाज में एक सज्जन कहते हैं- ‘मंदिर बनल ना नोट मिलल, साफ भईल न गंगा ...’। अब समझ जाइए, काशी का माहौल कैसा है ? कोदई चौकी के पास प्रवीन त्रिपाठी बेबाकी से कहते हैं, काशी के लोगों में नाराजगी थी लेकिन मोदी ने तीन दिन यहां रहकर दूर कर दी। वाराणसी दक्षिण ही नहीं, कैंट और उत्तर में भी भाजपा जीतेगी।
काशी के नतीजे देंगे कई संकेत
काशी के लोग क्या सोच रहे हैं, वे बुधवार को ईवीएम का बटन दबाकर बता देंगे। हार-जीत किसी की हो लेकिन काशी के चुनावी नतीजे कई संकेत देंगे। काशी में भगवा लहराया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी फिर यहीं से ताल ठोकेंगे। देश की सांस्कृतिक राजधानी से भाजपा अपने एजेंडे पर तेजी से बढ़ेगी। परिणाम प्रतिकूल रहे तो भाजपा को यहां की भावना को काशी के नजरिये से समझना पड़ेगा। काशी को बड़े पदों से लुभाया नहीं जा सकता, इसे फक्कड़ी, अल्हड़पन से समझा जा सकता है। हालांकि भाजपा नेताओं का दावा है कि लोकसभा चुनाव की तरह काशी का मोदी में पूरा भरोसा है।
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काशी, प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है तो पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जन्मभूमि। काशी ने देश व दुनिया को दर्शन, लेखन, संगीत में तमाम मनीषी दिए हैं तो राजनीति में भी हमेशा अहम भूमिका निभाई है। माना जाता है कि तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना भी काशी की पवित्र माटी पर गंगा की गोद में बैठकर की थी। कबीर, रविदास, स्वामी रामानंद से लेकर मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रविशंकर, गिरजा देवी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और हरि प्रसाद चौरसिया समेत न जाने कितने नाम हैं, जिन्होंने काशी में साधना कर देश, दुनिया में अलग पहचान बनाई। यहां के लोग किसी के नाम से नहीं बल्कि भोलेपन, सादगी, नम्रता से ज्यादा रीझते हैं। रीझें भी क्यों नहीं, यह भोले की नगरी जो है।
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आजकल वाराणसी के लोग चुनावी गुणा-भाग में ज्यादा मशगूल हैं। कहीं मोदी का गुणगान है तो कहीं उनकी आलोचना करते लोग। कहीं भाजपा उम्मीदवार के संकट में होने तो कहीं उनकी बड़ी जीत के दावे। बाहरी लोग चर्चा में शामिल होते हैं तो काशी के लोग यह बताना नहीं भूलते कि काशी कुछ अलग ढंग से सोचती है।
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काशी ने मोदी को सड़कों पर उतारा
दशाश्वमेध रोड, गोदौलिया, मैदागिन, चौक, लहुराबीर हो या चौक, हर जगह चर्चा चुनाव की है। लोग कहते हैं कि पहले 6 चरणों में मोदी ने हर चरण में तीन-तीन रैलियां की लेकिन सबसे कम सीट होने के बावजूद सातवें चरण में उन्होंने 5 रैलियां, एक सम्मेलन और तीन रोड शो किए। मंदिरों, आश्रमों में गए सो अलग। लोकसभा चुनाव में जहां आने भर से मोदी को बड़ी जीत मिल गई थी, उसी काशी में उन्हें अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए तीन दिन बिताने पड़े।
खूब हुई प्रतीकों की राजनीति
मोदी को प्रतीकों, भावनात्मक मुद्दों के जरिये लोगों से कनेक्ट करने में महारत हासिल है। काशी में उन्होंने प्रतीकों के जरिये खूब राजनीति की। ‘बाबा’ और ‘काशी के कोतवाल’ के दरबार में दस्तक दी। ये विश्व प्रसिद्ध मंदिर वाराणसी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में पड़ते हैं। यह वही सीट है, जहां भाजपा ने सात बार के विधायक श्याम देव चौधरी (दादा) का टिकट काटकर नीलकंठ तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। बाबा विश्वनाथ के दरबार में मोदी जब दादा का हाथ पकड़कर गए तो इसके मायने थे। इससे दादा की नाराजगी कम जरूर हुई है। वह भाजपा के लिए वोट तो मांग रहे हैं मगर प्रत्याशी नीकलंठ का नाम नहीं ले रहे। वहीं, गढ़वाघाट आश्रम जाकर मोदी ने यदुवंशियों व उनके अन्य अनुयायियों को लुभाने की कोशिश की। लाल बहादुर शास्त्री के पैतृक आवास पर उन्हें श्रद्धांजलि देने गए तो इसके पीछे मंशा चुनावी माहौल में कायस्थों को जोड़ने की रही। प्रतीकात्मक राजनीति में राहुल और अखिलेश भी पीछे नहीं रहे। काशी की जंग में जीत का आशीर्वाद लेने के लिए वह भी बाबा विश्वनाथ की शरण में गए।
बाबा की धरती पर सभी की परीक्षा
बाबा विश्वनाथ की धरती सभी दलों की परीक्षा ले रही है। दशाश्वमेध रोड पर चाय की चुस्की के साथ विजय प्रताप सिंह कहते हैं कि मोदी का यहां तीन दिन रहना बता रहा है कि काशी की फिजा बदली हुई है। वह कहते हैं, काशी के बारे में कोई अपनी सोच नहीं बदलता तो काशी उसे बदल देती है। वह कहते हैं कि उम्मीदवारों के चयन में अमित शाह काशी की भावना को नहीं समझ पाए। यही वजह है कि मोदी को तीन दिन में 30-32 घंटे सड़कों पर रहना पड़ा। काशी को समझने में भूल भाजपा को भारी पड़ सकती है। फगुनहटा भरे अंदाज में एक सज्जन कहते हैं- ‘मंदिर बनल ना नोट मिलल, साफ भईल न गंगा ...’। अब समझ जाइए, काशी का माहौल कैसा है ? कोदई चौकी के पास प्रवीन त्रिपाठी बेबाकी से कहते हैं, काशी के लोगों में नाराजगी थी लेकिन मोदी ने तीन दिन यहां रहकर दूर कर दी। वाराणसी दक्षिण ही नहीं, कैंट और उत्तर में भी भाजपा जीतेगी।
काशी के नतीजे देंगे कई संकेत
काशी के लोग क्या सोच रहे हैं, वे बुधवार को ईवीएम का बटन दबाकर बता देंगे। हार-जीत किसी की हो लेकिन काशी के चुनावी नतीजे कई संकेत देंगे। काशी में भगवा लहराया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी फिर यहीं से ताल ठोकेंगे। देश की सांस्कृतिक राजधानी से भाजपा अपने एजेंडे पर तेजी से बढ़ेगी। परिणाम प्रतिकूल रहे तो भाजपा को यहां की भावना को काशी के नजरिये से समझना पड़ेगा। काशी को बड़े पदों से लुभाया नहीं जा सकता, इसे फक्कड़ी, अल्हड़पन से समझा जा सकता है। हालांकि भाजपा नेताओं का दावा है कि लोकसभा चुनाव की तरह काशी का मोदी में पूरा भरोसा है।