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उजबेकिस्तान के बच्चे का गुरदासपुर में इलाज
अमर उजाला,गुरदासपुर
Updated Tue, 05 Nov 2013 11:32 PM IST
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गुरदासपुर। स्थानीय अबरोल मेडिकल सेंटर के डाक्टर अजय अबरोल ने उजबेकिस्तान से आए 10 साल के बच्चे अबरार जैनब का सफल आपरेशन कर उसे जीवन भर अंपग रहने से निजात दिला दी है। यह बच्चा तीन वर्ष की उम्र से ही सुदाथ्रोसिस आफ द टिबिया की बीमारी से पीड़ित था।
डॉ. अबरोल ने बताया कि बच्चे का इलाज हड्डी में कई जगह जोड़ लगा कर किया गया जबकि इसमें कोई राड़ या प्लेट नही डाली गई। इलाज बेहद नैच्यूरल तरीके से किया गया और इसमें इलिज्ररोव तकनीक अपनाई गई। उन्होने बताया कि हड़्डी एक दिन में एक मिलीमीटर बढ़ाई गई। इसके लिए पहले बच्चे, उसके परिजनों को पूरी तरह तैयार किया गया।
डॉक्टर अजय अबरोल ने प्रेस वार्ता के दौरान बताया कि अबरारजैनब के माता पिता ने 2006 से 2013 तक कई इंटरनेशनल डाक्टरों से इलाज करवाया था। इलाज के दौरान बच्चे की टंाग की हड्डी एक जगह से जुड़ना रुक गई जिससे उसकी टांग टेडी और दो इंच छोटी हो गई थी।
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इससे यह बच्चा 2006 से पूरी तरह बैसाखियों पर निर्भर हो गया था। इसके बाद बच्चे के अभिभावकों ने इंटरनेट पर सुदाथ्रोसिस आफ द टिबिया का इलाज, अलग अलग देशों के विशेषज्ञ डाक्टरों के नाम ढूंढने शुरू किए। डाक्टरों का अनुभव और उनके द्वारा किए इलाज के नतीजे जानने के बाद उन्होंने गुरदासपुर के डॉ. अबरोल सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल के बारे में पढ़ा। इसके बाद उन्होंने उजबेकिस्तान के दूतावास के माध्यम से अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. अजय अबरोल से संपर्क किया। अबरारजैनब की बीमारी से संबंधित कई टैस्टों की जांच के बाद डॉ. अबरोल ने उसके अभिभावकों को आपरेशन की सलाह दी। उन्होंने बताया कि उजबेकिस्तान से अबरारजैनब का परिवार 30 अक्तूबर को गुरदासपुर आया। एक नवंबर को चार घंटे के सफल आपरेशन के बाद 4 नवंबर को अबरार जैनब को पहली बार उसके पैरों पर पूरा भार डालकर चलाया गया।
डॉ. अबरोल ने बताया कि सुदाथ्रोसिस आफ द टिबिया बेहद दुर्लभ बीमारी है। इस बच्चे को यह बीमारी जन्म से थी। पहली बार तीन साल की उम्र में जब बच्चा चलने लगा तो वह चल नही पाया। उसके चोट लगने के बाद वहां के डाक्टरों ने प्लास्टर लगा कर हड्डी जोड़ने की कोशिश की लेकिन हड्डी जुड़ने की बजाए छोटी होती चली गई। उन्होंने बताया कि बच्चे का इलाज हड्डी में कई जगह जोड़ लगा कर किया गया, इसमें कोई राड़ या प्लेट नही डाली गई। इलाज बेहद नैच्यूरल तरीके से किया गया और इलिज्ररोव तकनीक अपनाई गई।
उन्होंने बताया कि हड्डी एक दिन में एक मिलीमीटर बढ़ाई गई। इसके लिए पहले बच्चे को और उसके परिजनों को पूरी तरह तैयार किया गया। डा अबरोल ने कहा कि उनके आपरेशन की सफलता का श्रेय उनकी टीम को जाता है। बच्चे के अभिभावकों ने डाक्टर अबरोल का तहेदिल से धन्यवाद दिया। उनके द्वारा किए आपरेशन से उसका पूरा जीवन अपंग होने से बच गया। डॉक्टर अबरोल ने बताया कि दूतावास से सलाह लेने के बाद ही बच्चे के अभिभावकों को 10 दिन का वीजा दिया गया था। उन्होंने बताया कि बच्चे को इसके बाद किसी भी आपरेशन की कोई जरूरत नही पड़ेगी।
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डॉ. अबरोल ने बताया कि बच्चे का इलाज हड्डी में कई जगह जोड़ लगा कर किया गया जबकि इसमें कोई राड़ या प्लेट नही डाली गई। इलाज बेहद नैच्यूरल तरीके से किया गया और इसमें इलिज्ररोव तकनीक अपनाई गई। उन्होने बताया कि हड़्डी एक दिन में एक मिलीमीटर बढ़ाई गई। इसके लिए पहले बच्चे, उसके परिजनों को पूरी तरह तैयार किया गया।
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डॉक्टर अजय अबरोल ने प्रेस वार्ता के दौरान बताया कि अबरारजैनब के माता पिता ने 2006 से 2013 तक कई इंटरनेशनल डाक्टरों से इलाज करवाया था। इलाज के दौरान बच्चे की टंाग की हड्डी एक जगह से जुड़ना रुक गई जिससे उसकी टांग टेडी और दो इंच छोटी हो गई थी।
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इससे यह बच्चा 2006 से पूरी तरह बैसाखियों पर निर्भर हो गया था। इसके बाद बच्चे के अभिभावकों ने इंटरनेट पर सुदाथ्रोसिस आफ द टिबिया का इलाज, अलग अलग देशों के विशेषज्ञ डाक्टरों के नाम ढूंढने शुरू किए। डाक्टरों का अनुभव और उनके द्वारा किए इलाज के नतीजे जानने के बाद उन्होंने गुरदासपुर के डॉ. अबरोल सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल के बारे में पढ़ा। इसके बाद उन्होंने उजबेकिस्तान के दूतावास के माध्यम से अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. अजय अबरोल से संपर्क किया। अबरारजैनब की बीमारी से संबंधित कई टैस्टों की जांच के बाद डॉ. अबरोल ने उसके अभिभावकों को आपरेशन की सलाह दी। उन्होंने बताया कि उजबेकिस्तान से अबरारजैनब का परिवार 30 अक्तूबर को गुरदासपुर आया। एक नवंबर को चार घंटे के सफल आपरेशन के बाद 4 नवंबर को अबरार जैनब को पहली बार उसके पैरों पर पूरा भार डालकर चलाया गया।
डॉ. अबरोल ने बताया कि सुदाथ्रोसिस आफ द टिबिया बेहद दुर्लभ बीमारी है। इस बच्चे को यह बीमारी जन्म से थी। पहली बार तीन साल की उम्र में जब बच्चा चलने लगा तो वह चल नही पाया। उसके चोट लगने के बाद वहां के डाक्टरों ने प्लास्टर लगा कर हड्डी जोड़ने की कोशिश की लेकिन हड्डी जुड़ने की बजाए छोटी होती चली गई। उन्होंने बताया कि बच्चे का इलाज हड्डी में कई जगह जोड़ लगा कर किया गया, इसमें कोई राड़ या प्लेट नही डाली गई। इलाज बेहद नैच्यूरल तरीके से किया गया और इलिज्ररोव तकनीक अपनाई गई।
उन्होंने बताया कि हड्डी एक दिन में एक मिलीमीटर बढ़ाई गई। इसके लिए पहले बच्चे को और उसके परिजनों को पूरी तरह तैयार किया गया। डा अबरोल ने कहा कि उनके आपरेशन की सफलता का श्रेय उनकी टीम को जाता है। बच्चे के अभिभावकों ने डाक्टर अबरोल का तहेदिल से धन्यवाद दिया। उनके द्वारा किए आपरेशन से उसका पूरा जीवन अपंग होने से बच गया। डॉक्टर अबरोल ने बताया कि दूतावास से सलाह लेने के बाद ही बच्चे के अभिभावकों को 10 दिन का वीजा दिया गया था। उन्होंने बताया कि बच्चे को इसके बाद किसी भी आपरेशन की कोई जरूरत नही पड़ेगी।