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स्वामी विवेकानंद के जीवन में बनारस के बंदर और एक विदेशी महिला इसलिए थी खास
Thu, 12 Jan 2017 12:06 PM IST
राकेश्ा झा/टीम डिजिटल
राकेश्ा झा/टीम डिजिटल
Updated Thu, 12 Jan 2017 12:06 PM IST
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स्वामी विवेकानंद
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स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से हिमालय के किसी एकांत स्थान में योग समाधि के लिए जाने की अनुमति मांगी। रामकृष्ण ने कहा, आसपास के लोग जब भूख से तड़प रहे हों और चारों तरफ अज्ञान का अंधेरा छाया हो, तो तुम्हारी आत्मा क्या स्वीकार करेगी कि एकांत समाधि में जाओ? स्वामी रामकृष्ण के निधन के बाद दक्षिणेश्वर मंदिर की व्यवस्था बदलने लगी थी। उनके तमाम शिष्य भी यहां-वहां बिखरने लगे। स्वामी विवेकानंद भी दीन-दुखियों की सेवा के लिए निकले। फिलहाल उन्होंने तीर्थाटन का मन बनाया। यात्रा के दौरान कुछ समय वह बनारस में भी रहे।
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स्वामी विवेकानंद
वहीं किसी दिन वह मां दुर्गा के मंदिर के पास से निकल रहे थे कि तभी बंदरों ने उन्हें घेर लिया। वे नजदीक आने लगे और डराने लगे। बंदर उनके हाथ में रखा प्रसाद भी छीनने लगे। स्वामी जी खुद को बचाने के लिए भागने लगे। पर बंदर तो पीछे ही पड़ गए थे, वे उन्हें दौड़ाने लगे। पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी यह सब देख रहे थे। उन्होंने स्वामी जी को रोककर कहा, रुको! डरो मत, उनका सामना करो। यह सुनकर स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों की तरफ बढ़ने लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उनके ऐसा करते ही सभी बंदर तुरंत भाग गए।
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स्वामी विवेकानंद
इस घटना का स्वामी जी ने कई बार जिक्र किया। वह कहते थे कि बंदरों से डरकर मैं चुप रह जाता, तो स्वामी परमहंस के बाद हम लोगों की जैसी दशा हो गई थी, उसे संभालते और खुद को बचाते हुए ही हम अपना जीवन गुजार देते। वह स्वामी जी ही थे, जो संन्यासी के रूप में मुझे अभय का संदेश देकर चले गए। तभी से यह मंत्र मिला कि कभी डरकर भागो मत, पलटो और सामना करो। इस तरह बनारस के बंदर ने विवेकानंद को बड़ा ज्ञान दिया।
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स्वामी विवेकानंद
इसके बाद एक बार जब स्कॉटलैंड के नेशनल पार्क में स्वामी विवेकानंद का ओजस्वी भाषण दे रहे थे तब उन्होंने कहा कि संसार का नया निर्माण करने के लिए थोड़े से लोगों की जरूरत है। ज्यादा नहीं, सिर्फ बीस लोग मिल जाएं, तो भी काफी हैं। सच्चा आत्मसमर्पण करने वाले सिर्फ बीस लोकसेवक मिल जाएं, तो मैं दुनिया की तस्वीर ही बदल दूं। भाषण बहुत पसंद किया गया और उसकी सराहना भी की गई, पर सच्चे आत्मसमर्पण वाली मांग पूरी करने के लिए एक भी तैयार न हुआ। दूसरे दिन प्रातःकाल स्वामीजी सोकर उठे, तो उन्हें दरवाजे से सटी खड़ी एक महिला दिखाई दी। वह हाथ जोड़े खड़ी थी। स्वामीजी इतने सवेरे उस महिला को देखकर हैरा हुए। उन्होंने परिचय जानने के बाद कहा, देवी इतनी सुबह क्या बात है? आप ठीक तो है न।
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निवेदिता
महिला का नाम मिस नोबल था। उसने कहा, मैं पूरी तरह स्वस्थ और कुशल हूं। फिर स्वामीजी ने मिस नोबल से आने का कारण पूछा। वह पूछने लगे कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं। मिस नोबल कुछ कहे, इसके पहले उनका गला रुंध आया। आंखें भीग उठीं। रुंधे कंठ और भीगे नयनों से मिस नोबल ने स्वामी विवेकानंद से कहा, स्वामीजी! कल आपने दुनिया का नक्शा बदलने के लिए सच्चे मन से आत्मसमर्पण करने वाले बीस साथियों की मांग की थी। बाकी उन्नीस कहां से आएंगे, यह मैं नहीं जानती, पर एक मैं आपके सामने हूँ।
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