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क्रिसमस 2017: जानिए ईसा की करुणा, बुद्ध का प्रेम

Sat, 23 Dec 2017 08:40 AM IST
अमर उजाला डेस्क
अमर उजाला डेस्क Updated Sat, 23 Dec 2017 08:40 AM IST
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प्राचीन दस्तावेजों में उल्लेख मिलता है कि ईसा से करीब दो सौ वर्ष पूर्व यूरोप में ‘असेसियन’ संप्रदाय प्रचलित था। संप्रदाय के संस्थापक थे ’एसो’ या ‘एसिन’। मृत सागर के पश्चिमी तट पर एंगदी नामक नगर में इस संप्रदाय का प्रधान मठ था। इसकी मान्यताएं संन्यास धर्म प्रधान थीं। ईसा इसी संप्रदाय  के अनुयायी थे। इसके संकेत बाइबिल के मैथ्यू 5—34, 19—12 में  जेम्स 5—12 में —कृत्य 4-32, 35 में मौजूद है। 


यहूदी धर्म, कर्म प्रधान धर्म है। बौद्ध धर्म, ईसा से बहुत पहले ही यूरोप में फैल चुका था। असेसियन धर्म और कुछ नहीं, बौद्ध धर्म का स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाकर किया गया प्रचार था। ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के साथ उनके संस्थापकों का चरित्र चित्रण भी लगभग समान ही है। जैसे ईसा के उपदेश, बुद्ध के अहिंसा, प्रेम और करुणा की शिक्षा से मेल खाते हैं। पश्चिमी विद्वान आर्थर लिल ने सिद्धांत और व्यवहार की इस समानता का उल्लेख करते हुए ईसाई धर्म पर बौद्ध धर्म की छाप को स्वीकार किया है। 

मैथ्यू रचित सुसमाचार में (2-5) पूर्व देश से ईसा के जन्म के समय ज्ञानीजनों के आगमन का वर्णन है। प्लूटार्क ने लाल समुद्र को पार कर अलैक्जेण्ड्रिया में बौद्ध यात्रियों के आने का वर्णन किया है। 
अशोक के शिला लेखों में भी इनका उल्लेख है। नाथ संप्रदाय  की पुस्तक ‘नाथ नामावली’ के अनुसार, ईसा चौदह वर्ष की आयु में भारत आए। उन्होंने शिव की उपासना की। वह भक्ति का प्रचार करने अपने देश लौट गए। जहां उन्हें सूली पर चढ़ाने का दंड मिला। एक समर्थ गुरु ने उन्हें सूली से उतार लिया और उन्हें भारत ले आए। होश में आने के बाद ईसा ने हिमालय पर तपस्या की। ईसा को मृत्यु दंड तो दिया गया था, पर जान से नहीं मारा गया।

मत्ती 27—29 के अनुसार, न्यायाधीश पीलातुस की पत्नी ने अपने पति को समझाया कि संत को मारा न जाए। मत्ती 27-12 से 24 तक के अनुसार, पीलातुस स्वयं भी ऐसा ही चाहते थे कि दंड की घोषणा तो हो पर जान न ली जाए। न्यू टेस्टामेंट बाइबिल में मरकुस ने लिखा है—यूसुफ जब ईसा की लाश मांगने न्यायाधीश पीलातुस के पास गए, तो लाश उन्हें दे दी गई। उन दिनों फांसी लगाने के बाद अपराधी के पैर तोड़ दिए जाते थे ताकि वह मर जाए, ईसा के पैर नहीं तोड़े गए। यूसुफ ने लाश को एक सफेद कपड़े में लपेटकर एक सुरक्षित गुफा में सुला दिया। मूर्छा समाप्त होने पर ईसा, गुफा मार्ग से बाहर निकल गए। डॉक्टर हार्वे स्पेंशर लुईस ने अपनी पुस्तक “मिस्टिकल लाइफ आफ जीसस” में यही सिद्ध किया कि ईसा ने हिन्दू संन्यासी के रूप में भारत में शिक्षा प्राप्त की और वे सूली पर लटकाए जाने के बाद भारत में आकर रहे।

 
 
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अजीज कश्मीरी ने अपनी पुस्तक ‘क्राइस्ट इन कश्मीर’ में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ईसा पुनर्जीवन के उपरांत, यहां आकर रहे और वहीं उनका अंत हुआ। सर जफरुल्ला खां ने भी अपने एक लेख में कहा है कि ईसा अपने माता-पिता समेत भारत आकर बसे। पिंडी प्वाइंट में उनकी माता का देहांत हुआ, जहां उनकी कब्र आज भी मौजूद है। ईसा भी अंत तक कश्मीर में ही रहे। भविष्य पुराण प्रकरण. 3 अ. 2 श्लोक 21 से 23 में शकाधीश शालि वाहन की भेंट ईसा से होने का उल्लेख है। इस उल्लेख में उन्होंने स्वयं अपनी स्थिति स्पष्ट की है।
एकदा तु शकाधीशो हिमि तुग समज्ययी। हूण देशस्य मध्ये वै गिरिस्थं पुरुषं शुभम्। 
को भवानिति तं प्राह सहोवाच मुदान्वितः। ईसा पुत्रञ्च माँ विद्धि कुमारी गर्भ संभवम्। 
निर्मर्यादि म्लेच्छ देशे मसीहोऽहं समागतः। ईसामसी च दस्यूनाँ प्रादुर्भूवा भयंकरी। 
तामहं म्लेच्छतः प्राप्य मसीहत्व मुपागतः। 
अर्थात्—एक बार शकराजा शालिवाहन हिमालय से आगे हूण देश में एक श्वेत वस्त्रधारी गौरांग संत से मिले। उन्होंने उनका परिचय पूछा। उत्तर में संत ने कहा मेरा नाम ईसा है। कुमारी पुत्र हूं। म्लेच्छ देश से आया हूं। मुझे मसीह कहते हैं। इस वर्णन में ईसा के व्यक्तित्व और इतिहास का परिचय उन मान्यताओं की पुष्टि करता है, जिनमें भारत में ईसा के धर्म शिक्षा प्राप्त करने का जिक्र किया है।

अमर उजाला के कल्पवृक्ष से साभार

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