प्राचीन दस्तावेजों में उल्लेख मिलता है कि ईसा से करीब दो सौ वर्ष पूर्व यूरोप में ‘असेसियन’ संप्रदाय प्रचलित था। संप्रदाय के संस्थापक थे ’एसो’ या ‘एसिन’। मृत सागर के पश्चिमी तट पर एंगदी नामक नगर में इस संप्रदाय का प्रधान मठ था। इसकी मान्यताएं संन्यास धर्म प्रधान थीं। ईसा इसी संप्रदाय के अनुयायी थे। इसके संकेत बाइबिल के मैथ्यू 5—34, 19—12 में जेम्स 5—12 में —कृत्य 4-32, 35 में मौजूद है।
क्रिसमस 2017: जानिए ईसा की करुणा, बुद्ध का प्रेम
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अजीज कश्मीरी ने अपनी पुस्तक ‘क्राइस्ट इन कश्मीर’ में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ईसा पुनर्जीवन के उपरांत, यहां आकर रहे और वहीं उनका अंत हुआ। सर जफरुल्ला खां ने भी अपने एक लेख में कहा है कि ईसा अपने माता-पिता समेत भारत आकर बसे। पिंडी प्वाइंट में उनकी माता का देहांत हुआ, जहां उनकी कब्र आज भी मौजूद है। ईसा भी अंत तक कश्मीर में ही रहे। भविष्य पुराण प्रकरण. 3 अ. 2 श्लोक 21 से 23 में शकाधीश शालि वाहन की भेंट ईसा से होने का उल्लेख है। इस उल्लेख में उन्होंने स्वयं अपनी स्थिति स्पष्ट की है।
एकदा तु शकाधीशो हिमि तुग समज्ययी। हूण देशस्य मध्ये वै गिरिस्थं पुरुषं शुभम्।
को भवानिति तं प्राह सहोवाच मुदान्वितः। ईसा पुत्रञ्च माँ विद्धि कुमारी गर्भ संभवम्।
निर्मर्यादि म्लेच्छ देशे मसीहोऽहं समागतः। ईसामसी च दस्यूनाँ प्रादुर्भूवा भयंकरी।
तामहं म्लेच्छतः प्राप्य मसीहत्व मुपागतः।
अर्थात्—एक बार शकराजा शालिवाहन हिमालय से आगे हूण देश में एक श्वेत वस्त्रधारी गौरांग संत से मिले। उन्होंने उनका परिचय पूछा। उत्तर में संत ने कहा मेरा नाम ईसा है। कुमारी पुत्र हूं। म्लेच्छ देश से आया हूं। मुझे मसीह कहते हैं। इस वर्णन में ईसा के व्यक्तित्व और इतिहास का परिचय उन मान्यताओं की पुष्टि करता है, जिनमें भारत में ईसा के धर्म शिक्षा प्राप्त करने का जिक्र किया है।
अमर उजाला के कल्पवृक्ष से साभार