देवभूमि उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के बायीं तरफ बसे पावन तीर्थ बदरीनाथ धाम भक्तों की अपार श्रद्धा व आस्था का केंद्र है। हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक यह तीर्थ स्थल नर और नारायण पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा हुआ है। भगवान विष्णु का यह पावन धाम उनके चतुर्थ अवतार नर एवं नारायण की तपोभूमि है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान विष्णु के इस पावन धाम में आने से व्यक्ति जन्म जन्मांतर के चक्र से मुक्त हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। यह पंच बद्री में से एक बद्री भी है। धार्मिक दृष्टि से उत्तराखंड में पंच बद्री, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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बदरीनाथ धाम में 6 महीने कपाट बंद के समय भी जलते रहता है दीप, जानें इतनी बर्फ में भी कैसे?
Wed, 08 Jan 2020 06:37 PM IST
योगेश जोशी
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: योगेश जोशी
Updated Wed, 08 Jan 2020 06:37 PM IST
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देवभूमि उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के बायीं तरफ बसे पावन तीर्थ बद्रीनाथ धाम भक्तों की अपार श्रद्धा व आस्था का केंद्र है
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मंदिर निर्माण
- आदि गुरु शंकराचार्य ने 8 वीं सदी में बद्रीनाथ धाम का निर्माण करवाया था। भगवान नारायण के वास के रूप में जाना जाने वाला बद्रीनाथ धाम आदि शंकराचार्य की कर्म स्थली रहा है। सोलहंवी सदी में गढ़वाल के राजा ने मंदिर के वर्तमान प्रारूप का निर्माण करवाया था।
मंदिर के पुजारी
- शंकराचार्य के वंशज ही मंदिर के पुजारी हैं, इन्हें रावल कहा जाता है। मंदिर में पूजा करने वाले पुजारी जी को ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना होता है।
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कपाट बंद होने पर भी जला रहता है दीप
- भगवान विष्णु के बद्रीनाथ धाम में एक मीटर ऊंची काले पत्थर (शालिग्राम) की प्रतिमा है, जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में सुशोभित है। यह मंदिर तीन भागों गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभा मंडप में बंटा हुआ है। मंदिर परिसर में अलग-अलग देवी-देवताओं की 15 मूर्तियां विराजमान हैं। अक्षय तृतीया पर बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, उस समय भी मंदिर में एक दीपक जलता रहता है, इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्त्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं।