दशहरा यानी विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व पर रावण दहन के साथ भगवान श्रीराम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। वहीं, मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय की स्मृति में भी यह दिन विशेष महत्व रखता है। विजयादशमी से जुड़ी कई धार्मिक परंपराओं में विजय मुहूर्त का खास स्थान है। मान्यता है कि इस समय शुभ कार्यों की शुरुआत करना सफलता, साहस और सकारात्मकता का प्रतीक होता है। यही वजह है कि दशहरे के दिन लोग नए काम शुरू करने, व्यापार से जुड़े निर्णय लेने और भविष्य की योजनाओं का संकल्प करने के लिए इस मुहूर्त को महत्व देते हैं।
दशहरे के दिन ‘विजय’ नाम का मुहूर्त क्यों माना जाता है खास? जानें विजयादशमी से जुड़ी मान्यता
दशहरे पर विजय मुहूर्त को बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस समय शुरू किए गए कार्यों में सफलता और विजय प्राप्त होती है। जानें विजय मुहूर्त का महत्व और इससे जुड़ी खास मान्यता।
विजय मुहूर्त क्या है और इसे क्यों शुभ माना जाता है?
हिंदू पंचांग में विजय मुहूर्त को दिन के विशेष शुभ समय के रूप में देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह समय विजय, आत्मविश्वास और बाधाओं पर काबू पाने की भावना से जुड़ा है। विजयादशमी के दिन इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यह पर्व स्वयं विजय का प्रतीक है। दशहरे पर विजय मुहूर्त में पूजा-पाठ, नए कार्यों की शुरुआत और महत्वपूर्ण संकल्प लेने की परंपरा है। कुछ लोग इस समय व्यापार या किसी नई योजना की शुरुआत करना भी शुभ मानते हैं। हालांकि, किसी कार्य में सफलता की गारंटी नहीं होती; यह मान्यता आस्था और परंपरा पर आधारित है।
भगवान श्रीराम और मां दुर्गा की विजय से जुड़ा है महत्व
विजयादशमी के महत्व को समझने के लिए इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं को भी जानना जरूरी है। रामायण की मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने इसी दिन रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया था। यह प्रसंग अन्याय, अहंकार और अधर्म पर विजय का संदेश देता है। वहीं, देवी महात्म्य की परंपरा के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिनों तक युद्ध करने के बाद दसवें दिन उसका संहार किया था। इसलिए विजयादशमी को शक्ति और धर्म की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। इन दोनों धार्मिक प्रसंगों के कारण यह दिन नई शुरुआत और दृढ़ संकल्प के लिए विशेष माना जाता है।
महाभारत काल से भी जुड़ी है विजय की मान्यता
विजयादशमी से जुड़ी एक अन्य प्रचलित मान्यता महाभारत के पांडवों से संबंधित है। कथा के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष में छिपाकर रखे थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद उन्होंने शमी वृक्ष से अपने हथियार वापस प्राप्त किए और आगे चलकर युद्ध में विजय हासिल की। इसी परंपरा के कारण दशहरे पर शमी के वृक्ष की पूजा करने और उसे शुभ मानने की मान्यता प्रचलित है। कुछ स्थानों पर इस दिन शस्त्र पूजा भी की जाती है। इसे साहस, सुरक्षा और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने का प्रतीक माना जाता है।
दशहरे पर कौन-कौन से शुभ कार्य किए जाते हैं?
- नए कार्य की शुरुआत: मान्यता के अनुसार, विजयादशमी पर नई योजना या काम का शुभारंभ करना अच्छा माना जाता है।
- शस्त्र पूजा: कई स्थानों पर औजारों, वाहनों और अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है। इसका उद्देश्य काम में सफलता और सुरक्षा की कामना करना है।
- शमी वृक्ष की पूजा: शमी को विजय और शुभता से जोड़ा जाता है। इस दिन इसकी पूजा करने की परंपरा भी है।
- अपराजिता पूजा: कुछ परंपराओं में मां दुर्गा के अपराजिता स्वरूप की पूजा की जाती है। इसे बाधाओं पर विजय और आत्मबल की कामना से जोड़ा जाता है।
- नई योजनाओं का संकल्प: लोग शिक्षा, करियर, कारोबार या निजी जीवन से जुड़े नए लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।