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Skand Shashti 2020 June: स्कंद षष्ठी आज, जानें कैसे करें भगवान कार्तिकेय की पूजा

Fri, 26 Jun 2020 07:07 AM IST
रुस्तम राणा ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: रुस्तम राणा Updated Fri, 26 Jun 2020 07:07 AM IST
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Skand Shashti 2020 June know puja vidhi muhurat and significance
स्कंद षष्ठी जून 2020 - फोटो : Social media

Skand Shashti 2020 June: स्कंद षष्ठी व्रत 26 जून को पड़ रहा है। यह व्रत भगवान कार्तिकेय के लिए रखा जाता है। स्कंद षष्ठी का व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन रखा जाता है और 26 तारीख को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है। यह व्रत मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में लोकप्रिय है। भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र हैं। आइए जानते हैं स्कंद षष्ठी व्रत का मुहूर्त, पूजा विधि एवं धार्मिक महत्व।



स्कंद षष्ठी व्रत का मुहूर्त
स्कंद षष्ठी प्रारम्भ - सुबह 7 बजकर 2 मिनट से (26 जून 2020)
स्कंद षष्ठी समाप्त - सुबह 5 बजकर 3 मिनट तक (27 जून 2020)

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शिव परिवार - फोटो : Social media

स्कंद षष्ठी व्रत विधि

  • सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें। 
  • इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें। 
  • पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें। 
  • पूजा जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें। 
  • अंत में आरती करें। 
  • वहीं शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें। 
  • इसके पश्चात फलाहार करें।
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स्कंदमाता - फोटो : SELF

स्कंद षष्ठी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से जीवन में हर तरह की कठिनाइंया दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। हालांकि यह त्योहार दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। उनका प्रिय पुष्प चंपा है। इसलिए इस व्रत को चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया था।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media

ऐसे हुआ था भगवान कार्तिकेय का जन्म
कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। 

इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे। 

उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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