Karwa Chauth 2021 Pujan Samagri : करवाचौथ का व्रत हर विवाहित नारी के मन को एक सुखद अनुभूति के एहसास से सराबोर कर देता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी आयु और दाम्पत्य जीवन में प्रेम तथा सामंजस्य के लिए पूरे दिन निर्जला रहकर करती हैं। भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ श्री गणेशजी की पूजा करती हैं। करवा चौथ दो शब्दों से मिलकर बना है -'करवा' यानि 'मिट्टी का बर्तन' और 'चौथ' यानि 'गणेश जी की प्रिय तिथि चतुर्थी'। करवाचौथ की पूजा में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक पूजा सामग्री का प्रतीकात्मक महत्व होता है। आइए जानते हैं क्या है इनका महत्व...
Karwa Chauth 2021 Pujan Samagri : जानिए करवाचौथ की पूजा में छलनी, दीपक, सींक और करवा का प्रतीकात्मक महत्व
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करवा व करवा माता की फोटो
करवा के बिना करवा चौथ की पूजा के कोई मायने नहीं है। करवा का अर्थ है,'करवा' यानि कि मिट्टी का वह बर्तन जिसे अग्रपूज्य गणेशजी का स्वरुप माना गया है। गणेशजी जल तत्व के कारक हैं एवं करवा में लगी हुई टूंटी गणेशजी की सूंड का प्रतीक मानी गई है।इस दिन मिटटी के करवा में जल भरकर पूजा में रखना मंगलकारी माना गया है। एक और मान्यता के अनुसार करवा उस नदी का प्रतीक भी है, जिसमें मगरमच्छ ने मां करवा के पति को पकड़ लिया था। वहीं करवा माता की तस्वीर की पूजा की जाती है। तस्वीर में माता का चित्र बना होता है। उनके अलावा इसमें पत्नी के व्रत की कहानी भी दर्शाई गई है।
दीपक और छलनी के मायने
करवा चौथ की पूजा में दीपक की रोशनी का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार अग्नि पृथ्वी पर सूर्य का बदला हुआ रूप है। मान्यता है कि अग्निदेव को साक्षी मानकर उसकी मौजूदगी में की गई पूजा अवश्य सफल होती है। प्रकाश ज्ञान का प्रतीक भी है, 'ईश्वर' प्रकाश और ज्ञान-रूप में ही हर जगह व्याप्त हैं। ज्ञान प्राप्त होने से अज्ञान रुपी मनोविकार दूर होते हैं, जीवन के कष्ट मिटते हैं। दीपक जलाने से नकारात्मकता दूर होती है, एवं पूजा में ध्यान केंद्रित होता है जिससे एकाग्रता बढ़ती है। इसके अलावा कुछ महिलाएं छलनी में दीपक रखकर चांद को देखती हैं और फिर पति का चेहरा देखती हैं। इसकी वजह करवा चौथ में सुनाई जानेवाली वीरवती की कथा से जुड़ा हुआ है। बहन वीरवती को भूखा देख उसके भाइयों ने चांद निकलने से पहले एक पेड़ की आड़ में छलनी में दीप रखकर चांद बनाया और बहन का व्रत खुलवाया।
सींक, शक्ति का प्रतीक
करवा चौथ व्रत की पूजा में सींक का होना बहुत ज़रूरी होता है। ये सींक मां करवा की शक्ति का प्रतीक है। कथा के अनुसार मां करवा के पति का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। तब उन्होंने कच्चे धागे से मगर को आन देकर बांध दिया और यमराज के पास पहुंच गईं। वे उस समय चित्रगुप्त के खाते देख रहे थे। करवा ने सात सींक लेकर उन्हें झाड़ना शुरू किया जिससे खाते आकाश में उड़ने लगे। करवा ने यमराज से पति की रक्षा मांगी, तब उन्होंने मगर को मारकर करवा के पति के प्राणों की रक्षा कर उसे दीर्घायु प्रदान की।
करवाचौथ की पूजा में मिट्टी या तांबे के कलश से चन्द्रमा को अर्ध्य दिया जाता है। पुराणों में कलश को सुख-समृद्धि,ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि कलश में सभी ग्रह,नक्षत्रों एवं तीर्थों का निवास होता है।इनके आलावा ब्रह्मा,विष्णु,रूद्र,सभी नदियों,सागरों,सरोवरों एवं तेतीस कोटि देवी-देवता कलश में विराजते हैं। इसके अलावा पूजा की थाली में रोली,चावल,दीपक, फल,फूल,पताशा,सुहाग का सामान और जल से भरा कलश रखा जाता है।करवा के ऊपर मिटटी की सराही में जौ रखे जाते हैं।जौ समृद्धि,शांति,उन्नति और खुशहाली का प्रतीक होते हैं। इन सभी सामग्रियों से करवा माता की पूजा की जाती है और आशीर्वाद लेकर अपने परिवार के मंगल कामना की प्रार्थना कर पूजा संपन्न की जाती है।