महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ा सकती हैं तो सेना का नेतृत्व क्यों नहीं?
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें राहत देते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि सेना में महिला को परमानेंट कमीशन दिया जाए। इसकी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ये सलाह भी दी कि महिलाओं को सीधी लड़ाई में नहीं उतारा जाना चाहिए, क्योंकि अगर उन्हें युद्ध बंदी बना लिया गया तो 'ये उस व्यक्ति, संस्था और पूरी सरकार के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर बहुत तनावपूर्ण होगा।'
इस बारे में रिटायर्ड मेजर जनरल राजेंद्र सिंह मेहता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि भारतीय सेना में महिलाएं बिल्कुल नहीं है। लेकिन अभी तक उन्हें कॉम्बैट भूमिका यानी युद्ध के मैदान में नहीं उतारा गया है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग भी इससे सहमति जताते हैं। वो कहते हैं कि भारतीय सेना में कॉम्बैट सपोर्ट सर्विसेज में कुछ हद तक महिलाएं कमांड करती हैं लेकिन उन्हें स्वतंत्र रूप से कमांड नहीं दी गई है। मेजर जनरल राजेंद्र सिंह मेहता के मुताबिक कॉम्बैट का मतलब है दुश्मन के साथ आमने-सामने की गुत्थम-गुत्थी वाली की लड़ाई करना। वो बताते हैं, "दुश्मन चाकू लगाकर वार करता है तो आपको भी राइफल में चाकू लगाकर वार करना होता है। ऐसी स्थिति में 20 से 40 मीटर की दूरी से फायर करना होता है। यहां तक कि मरने के लिए और घायल होने के लिए तैयार रहना होता है।"
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग कॉम्बैट आर्मी के बारे में समझाते हुए कहते हैं, "फौज में एक कॉम्बैट आर्म होती है - जो लड़ाई में जाती हैं। ये पैदल सेना और टैंक वगैरह पर सवार होते हैं। दूसरी है: कॉम्बैट सपोर्ट आर्म, जिनमें आर्टिलरी, इंजीनियर, सिग्नल आर्म शामिल होती हैं। तीसरी होती है: कॉम्बैट सपोर्ट सर्विसेज, जिसमें सप्लाई कोर, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल रिपेयर करने वाले लोग शामिल होते हैं। इन तीनों की अलग-अलग भूमिका है। कॉम्बेट आर्म में अब तक महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है। कॉम्बेट सपोर्ट आर्म में उन्हें कुछ हद तक जगह जरूर दी गई है और कुछ सर्विसेज में उनके लिए परमानेंट कमीशन भी लागू किया गया है।"।
एचएस पनाग के अनुसार, "कॉम्बैट यानी युद्ध में महिलाओं के जाने की बात एक अलग मसला है। फिलहाल कॉम्बैट सैनिक के लिए स्टैंडर्ड बहुत ऊंचे हैं और उस लिहाज से औरतों के स्टैंडर्ड बहुत कम हैं। जैसे, भर्ती के दौरान महिलाओं को एक किलोमीटर की दौड़ का टेस्ट पास करना होता है, वहीं पुरुषों को पांच किलोमीटर की। या तो उनके स्टैंडर्ड बराबर किए जाएं। मेरे हिसाब से देश की गिनी-चुनी महिलाएं ही कॉम्बैट के फ़िटनेस टेस्ट को पास कर पाएंगी।" रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल पनाग के मुताबिक एक दूसरी समस्या यह है कि जब कोई पुरुष सर्विस करता है तो उसकी पत्नी उसके बच्चों की देखभाल करती है, ऐसा महिला के मामले में नहीं होगा। वो बच्चों से दूर रहेगी तो उसके बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। वो कहते हैं, ''ये जेंडर इक्वलिटी की बात नहीं है। हां टास्क इक्वलिटी भी होनी चाहिए।''

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