अलका ‘सोनी’
कभी माना जाता था कि महिलाओं को विवाहित होना, सांस लेने के बराबर जरूरी है। लेकिन नए जमाने की महिलाएं अविवाहित यानी सिंगल रहना पसंद कर रही हैं। शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनकी सोच और स्थिति को बदला है। लेकिन क्या सिर्फ यही एक वजह है या कारण और भी हैं?
40 वर्षीय सुनीता ने केवल इस वजह से सामाजिक समारोहों में जाना छोड़ दिया कि हर जगह लोग यही पूछते हैं कि “शादी के लड्डू कब खिला रही हो?” समाज में महिलाओं का सिंगल रहना एक तरह से वर्जित माना जाता रहा है। अगर किसी समारोह में कोई अविवाहित/सिंगल महिला दिख जाए तो उसके बारे में तरह-तरह की बातें की जाती हैं। कई बार तो ऐसी महिलाओं का उत्सवों में जाना भी मुश्किल हो जाता है।
वस्तुतः यह समाज का नियम है कि जो चीज आपके पास न हो, लोग उसी के बारे में पूछते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से लड़कियों की रिश्तों में बंधने और कमिटमेंट में रहने की मानसिकता में तेजी से बदलाव आ रहा है। शादी, जिसे सात जन्मों का बंधन माना जाता था, उससे लड़कियां दूर जा रही हैं। आज उन्हें अकेले रहना और आत्मविश्वास से जीना भा रहा है। जमाने की रीति-नीति को झुठलाती ये लड़कियां पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से लबरेज दिखती हैं। आज उनकी प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं।
हाल ही में हुए एक अध्ययन की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं सिंगल रहना ज्यादा पसंद करती हैं। डाटा एनालिस्ट ‘मिंटेल’ द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, जहां 49 फीसदी पुरुष अपने सिंगल स्टेटस से खुश हैं, वहीं 61 फीसदी महिलाएं सिंगल रहना चाहती हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि सिंगल महिलाओं में लगभग 75 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने लिए साथी ढूंढने की कोशिश भी नहीं की, जबकि महिलाओं के मुकाबले ऐसे पुरुष केवल 65 फीसदी हैं।
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महिलाएं शादी क्यों नहीं करना चाहती हैं
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क्या होती है वजह
अध्ययन के नतीजों से यह बात सामने आई कि रिश्तों को चलाने के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा काम और मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि एक तरह से गृहस्थी की जिम्मेदारी हमारे देश में महिलाओं के हिस्से में ही डाल दी जाती है। रिलेशनशिप एक्सपर्ट की मानें तो महिलाएं रिश्तों को निभाने के साथ-साथ घर के कामकाज, जैसे कि खाना बनाना, घर-परिवार का ध्यान रखना, बच्चों की परवरिश करना और रिश्तों में होने वाली छोटी-मोटी लड़ाइयों का निपटारा करने जैसी चीजों में इतना ज्यादा उलझ जाती हैं कि एक समय के बाद उनकी रिश्तों के प्रति रुचि ही खत्म हो जाती है। उन्हें ये सब उलझन प्रतीत होने लगता है। वे अपना ‘मी’ टाइम मिस करने लगती हैं। नतीजतन, वे विवाह के बंधन से दूर भागने लगती हैं।
शादी और बच्चे को औरत की संपूर्णता से जोड़ने वाला यह दृष्टिकोण वक्त के साथ बदला है। अब सिर्फ शादी और बच्चे पैदा करना ही किसी महिला की प्राथमिकता नहीं रह गई है। 35 वर्षीय अकाउंटेंट प्रेरणा बताती हैं कि वे सिंगल वीमेन हैं। उन्हें विवाह करने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई।
वह कहती हैं, “मेरी जिंदगी में भी बहुत से लोग और दोस्त हैं, जिनके साथ मैं खुश हूं।” उनके साथ उनकी ही एक दोस्त भी रहती हैं। दोनों अपनी जिंदगी में खुश हैं। अब तो घरवालों ने भी हारकर उन्हें शादी के लिए बोलना छोड़ दिया है। मजरूह सुल्तानपुरी ने ठीक ही कहा है, “मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।” शायद आज के समय में यह शे’र इन महिलाओं पर फिट बैठता है। लेकिन सिर्फ अकेले ही जीवन जीना, विवाह को नकारने का कारण नहीं है, कई अन्य पहलू भी हैं, जिन पर गौर करने की आवश्यकता है, ताकि आप यह जान सकें कि आखिर आज युवतियों का रुझान विवाह के प्रति कम क्यों हो रहा है!
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कोई शिकायत नहीं जिंदगी से
अब महिलाएं करियर, सामाजिक रुतबा और मन-मुताबिक जिंदगी जीने को तवज्जो देने लगी हैं। यही वजह है कि कई महिलाएं शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहतीं। हर किसी को अपने तरीके से जिंदगी जीने का हक है, मगर हमारे पुरुष प्रधान समाज में औरतों को हमेशा पुरुषों की मर्जी से चलना पड़ता है। लेकिन अब वक्त बदल रहा है। महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनकी स्थिति बदली है। सौ फीसदी न सही, लेकिन शिक्षित वर्ग की महिलाओं का एक बड़ा तबका अब अपनी शर्तों पर जिंदगी जी रहा है। समाज क्या कहेगा, इसकी चिंता छोड़कर ये महिलाएं वही करती हैं, जो उनका दिल कहता है। तभी तो आज अविवाहित महिलाओं की संख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। खास बात यह है कि इन सिंगल वीमेंस को अपने अकेलेपन से कोई शिकायत नहीं है और ये जिंदगी की रेस में जीत दर्ज करते हुए आगे बढ़ रही हैं।
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संपूर्णता और खुशी की गारंटी नहीं
‘पत्नी और मां बने बिना औरत अधूरी है!’ यह जुमला अब पुराने जमाने की बात हो गई है। 36 वर्षीय तनु कहती हैं, “मुझे नहीं लगता कि शादी संपूर्णता और खुशी की गारंटी है। मैंने अपने बहुत से दोस्तों को देखा है, जो शादीशुदा होने के बावजूद अकेलापन और खुद को प्यार से वंचित महसूस करते हैं। अपने अंदर की रिक्तता को आप खुद ही भर सकती हैं, कोई और नहीं। मैं अपने कॅरिअर में खुश हूं और अपने शौक पूरे करके संतुष्ट हूं।” आज अपने आस-पास टूट रहे वैवाहिक संबंधों को देखकर भी इन महिलाओं को अपने अकेले रहने के फैसले पर खुशी महसूस होती है।
तनु कहती हैं, “मैं घर से लेकर ऑफिस तक के काम में इतनी व्यस्त रहती हूं कि खुद के लिए भी फुरसत नहीं होती, तो अकेलापन कहां से महसूस होगा। वैसे भी घर में मम्मी-पापा सब हैं, तो कैसा अकेलापन।” इन महिलाओं को देखकर कहा जा सकता है कि कभी पति के दायरे में सिमटी रहने वाली भारतीय महिलाओं की सोच और जिंदगी अब तेजी से बदल रही है।
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सफलता के लिए विवाहित होना जरूरी नहीं
पहले किसी महिला की सफलता-असफलता का अंदाजा उसकी वैवाहिक स्थिति से लगाया जाता था। मतलब अगर महिला की शादीशुदा जिंदगी सुखी है तो वह सफल है और अगर वह असफल है तो इसके पीछे का कारण उसकी डिस्टर्बिंग वैवाहिक जिंदगी है। लेकिन आज की महिलाएं यह जान चुकी हैं कि उनकी सफलता का विवाह से कोई लेना-देना नहीं है। कोई महिला कितनी सफल है, यह उसके कॅरिअर और आत्मनिर्भर होने से जुड़ा मुद्दा है, न कि विवाह से जुड़ा।
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