फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें

फिल्मी पर्दे से कितना अलग है असली 'रामगढ़', खुद देख लें

Wed, 26 Aug 2015 01:50 PM IST
Updated Wed, 26 Aug 2015 01:50 PM IST
विज्ञापन

फिल्मी पर्दे से कितना अलग है असली 'रामगढ़', खुद देख लें

Actual picture of sholay's Ramgarah

शोले के गांव रामगढ़ का जिक्र आते ही जेहन में कई दृश्य घूमने लगते हैं। ठाकुर की हवेली में लालटेन बुझाती छोटी बहू, नीचे बैठ हारमोनियम बजाता जय, पानी की टंकी पर चढ़ा वीरू, बक-बक करती बसंती और न जाने क्या-क्या...। लेकिन ये सब फिल्मी है, असली रामगढ़ को जानेंगे तो दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे। (रिपोर्ट व तस्वीरेंः जनार्दन पांडेय, रामगढ़ से लौटकर)

फिल्मी पर्दे से कितना अलग है असली 'रामगढ़', खुद देख लें

Actual picture of sholay's Ramgarah

मैसूर के महाराजा के अधिकार क्षेत्र में आने वाला ये तालुका (छोटा कस्बानुमा इलाका) तब भी बेहद समृद्ध था, जो कि फिल्मी पर्दे पर दिखाए गए गांव से बिल्कुल मेल नहीं खाता। तब और अब भी इसका नाम है रामनगरम, न कि रामगढ़। कई दफे खबरें आईं कि शोले के हिट होने के बाद इसका नाम बदलकर रामगढ़ कर दिया गया है। लेकिन ऐसा नहीं है। पूरे कर्नाटक में रामगढ़ जैसी कोई जगह नहीं है।

फिल्मी पर्दे से कितना अलग है असली 'रामगढ़', खुद देख लें

Actual picture of sholay's Ramgarah

ताज्जुब की बात है कि जिस जगह पर हिन्दी फिल्म शोले के रामगढ़ की कल्पना की गई, वहां बोलना तो दूर गिने-चुने लोग हिन्दी समझ पाते हैं। वहां गब्बर सिंह जैसे खूंखार डाकू की कल्पना की गई, जहां आजतक कोई डाकू आया ही नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन

फिल्मी पर्दे से कितना अलग है असली 'रामगढ़', खुद देख लें

Actual picture of sholay's Ramgarah

शोले के रामगढ़ में लोग खौफ के चलते डाकू को अनाज देते थे। जबकि असली रामगढ़ में तब भी बेहतर पुलिस व्यवस्‍था थी। यहां तक एक दफे जब खुद ही सिप्पी एक परेशानी में फंसे...

विज्ञापन

फिल्मी पर्दे से कितना अलग है असली 'रामगढ़', खुद देख लें

Actual picture of sholay's Ramgarah

तो असली रामगढ़ के पुलिस स्टेशन सहायता के लिए पहुंचे थे। फिल्मी रामगढ़ में दिखाया गया कि गांव में बिजली नहीं है। ठाकुर की छोटी बहू हर शाम हवेली की लालटेन धीमी करती दिखती। लेकिन असली रामगढ़ में तब अच्छी खासी बिजली आती थी। फिल्म एक पानी की टंकी दिखाई गई। जबकि फिल्म में मजदूरी करने वाले मोहम्मद गौस बताते हैं कि यहां तब भी दो टंकियां थी।

अगली फोटो गैलरी देखें
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed