हमारे शरीर के अंदर मौजूद डीएनए को आमतौर पर एक ऐसी किताब समझा जाता है, जिसमें शरीर के काम करने की पूरी आनुवंशिक जानकारी दर्ज होती है। लेकिन इस किताब में कुछ ऐसे हिस्से भी हैं, जो हमेशा एक ही जगह टिके नहीं रहते। वे डीएनए के अंदर एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं। इन्हें वैज्ञानिक ‘जंपिंग जीन’ कहते हैं।
रोचक खबर: लाखों वर्षों से इंसानी जीन लेकर घूम रहा है ये वायरस, वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा; क्या होगा इसका असर?
Latest Study: वैज्ञानिकों को अब एक ऐसा वायरस मिला है, जो इंसानों से जुड़ा एक जीन करीब एक लाख साल से अपने साथ लेकर घूम रहा है। यह जीन सिर्फ वायरस के भीतर मौजूद ही नहीं है, बल्कि आज भी डीएनए में अपनी जगह बदलने की क्षमता रखता है।
वायरस में इंसानों से जुड़ा जीन
इंसान के शरीर में मौजूद जीन को आमतौर पर डीएनए के ऐसे हिस्से के रूप में देखा जाता है, जो शरीर की कोशिकाओं को जरूरी निर्देश देता है। वैज्ञानिकों को अब एक ऐसा वायरस मिला है, जो इंसानों से जुड़ा एक जीन करीब एक लाख साल से अपने साथ लेकर घूम रहा है।
- यह जीन सिर्फ वायरस के भीतर मौजूद ही नहीं है, बल्कि आज भी डीएनए में अपनी जगह बदलने की क्षमता रखता है।
- कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के जीवविज्ञानी सेड्रिक फेशोटे और उनके सहयोगियों ने बीसी200 नामक इस जीन को मोलस्कम कॉन्टेजियोसम वायरस (एमसीवी) में पाया। यह पॉक्सवायरस परिवार का वायरस है, जो केवल इंसानों को संक्रमित करता है और त्वचा पर छोटे उभरे हुए दाने या गांठ पैदा करता है।
- संक्रमण आम तौर पर हल्का होता है और कुछ महीनों में ठीक हो जाता है।
जर्नल साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि बीसी200 में दो विशेषताएं एक साथ मिली हैं, जिन्हें पहले कभी किसी इंसानी जीन में इस तरह नहीं देखा गया था।
बीसी200 जीन के बारे में जान लीजिए
बीसी200 मुख्य रूप से न्यूरॉन्स, यानी दिमाग की उन कोशिकाओं में पाया जाता है जो एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाने का काम करती हैं। लेकिन इसकी शुरुआत लाखों साल पहले एक ट्रांसपोसॉन से हुई थी।
- ट्रांसपोसॉन डीएनए का ऐसा हिस्सा होता है, जो अपने स्थान से निकलकर जीनोम यानी शरीर के पूरे आनुवंशिक नक्शे में किसी दूसरी जगह जाकर जुड़ सकता है। इसी वजह से इन्हें आसान भाषा में ‘जंपिंग जीन’ कहा जाता है।
- जब ऐसे ट्रांसपोसॉन किसी जीन के अंदर जाकर डीएनए का हिस्सा जोड़ देते हैं, तो उस जीन का सामान्य काम प्रभावित हो सकता है। कई बार इससे बीमारी भी हो सकती है।
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक सेड्रिक फेशोटे के मुताबिक, आमतौर पर जब किसी ट्रांसपोसॉन से कोई नया जीन बनता है और वह शरीर के किसी काम के लिए इस्तेमाल होने लगता है, तो समय के साथ उसकी इधर-उधर जाने की क्षमता खत्म हो जाती है।
क्या बीसी200 कैंसर और अल्जाइमर से भी जुड़ा हो सकता है?
शोधकर्ताओं को यह भी शक है कि बीसी200 त्वचा की कोशिकाओं में इसलिए पहुंचा होगा, क्योंकि मोलस्कम कॉन्टेजियोसम वायरस मुख्य रूप से त्वचा की कोशिकाओं को ही संक्रमित करता है। इसके अलावा, कुछ कैंसर वाली कोशिकाओं में भी बीसी200 सामान्य से ज्यादा मात्रा में पाया गया है। अल्जाइमर रोग से पीड़ित मरीजों के दिमाग में भी इस जीन की मात्रा अधिक पाई गई है।
अभी वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इसकी ‘जंपिंग’ क्षमता इन बीमारियों में कोई भूमिका निभाती है या नहीं?
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स्रोत:
Escape of the BC200 gene to a human poxvirus reveals its persistent transposition in primates
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