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हेल्थ की बात: बच्चों का ब्लड प्रेशर भी हो सकता है हाई, माता-पिता इन लक्षणों को बिल्कुल न करें अनदेखा

Mon, 26 Oct 2026 10:33 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 26 Oct 2026 10:33 PM IST
सार

High BP In Children: बच्चों का ब्लड प्रेशर उनकी उम्र, लंबाई और लिंग के अनुसार अलग होता है। मोटापा, किडनी की बीमारी और खराब जीवनशैली हाई बीपी का जोखिम बढ़ा सकते हैं। तीन साल से अधिक उम्र के बच्चों का बीपी नियमित रूप से जांचना जरूरी है। लगातार बढ़ी रीडिंग आने पर डॉक्टर से सलाह लें।

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High Blood Pressure in Kids know Symptoms and Risks
बच्चों में ब्लड प्रेशर की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI

हाई ब्लड प्रेशर को सेहत के लिए सबसे खतरनाक स्वास्थ्य स्थितियों में से एक माना जाता है। अगर इसे कंट्रोल न किया जाए तो इससे दिल की बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। ये भी माना जाता रहा है कि ब्लड प्रेशर की दिक्कत सिर्फ वयस्कों और बुजुर्गों को होती है, पर असलियत ये है कि बच्चे भी इस समस्या का शिकार हो सकते हैं।



पिछले दो दशकों में, 19 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों में हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) के मामले लगभग दोगुने हो गए हैं। साल 2000 में यह दर लगभग 3% थी, जो 2020 तक बढ़कर 6% से अधिक हो गई है। वर्तमान में दुनिया भर में लगभग 11.4 करोड़ युवा इससे प्रभावित हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, बच्चों में मोटापा, शारीरिक गतिविधियों की कमी, खानपान की गड़बड़ी और कुछ बीमारियों के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा देखा जा रहा है। परेशानी की बात यह है कि कई बच्चों में हाई बीपी के स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में माता-पिता को पता ही नहीं चलता कि बच्चे को ये दिक्कत तो नहीं? कहीं आपका बच्चा भी तो इसका शिकार नहीं है?

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High Blood Pressure in Kids know Symptoms and Risks
बच्चों में ब्लड प्रेशर की समस्या - फोटो : Freepik.com

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं बच्चों का ब्लड प्रेशर उनकी उम्र, लंबाई और लिंग के हिसाब से अलग हो सकता है। इसलिए बड़ों के लिए इस्तेमाल होने वाली सामान्य रीडिंग से बच्चों का बीपी नहीं मानना चाहिए। 

बच्चों का ब्लड प्रेशर कितना होना चाहिए?

मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक छोटे बच्चों में सामान्य बीपी की रीडिंग किशोरों से अलग होती है। इसलिए सभी बच्चों के लिए 120/80  को सामान्य मानना सही नहीं है। 1 से 13 वर्ष की आयु के बच्चों की रीडिंग 90mmHg से कम होनी चाहिए।

नवजात शिशुओं का औसत बीपी लगभग 64/41 mmHg होता है।

  • 3 से 6 महीने: लगभग 70-90 / 50-65 mmHg
  • 6 से 12 महीने: लगभग 80-100 / 55-65 mmHg
  • 1 से 3 साल: लगभग 90-105 / 55-70 mmHg
  •  3 से 6 साल: लगभग 95-110 / 60-75 mmHg
  • 6 से 12 साल: लगभग 100-120 / 60-75 mmHg
  • 13 वर्ष या उससे अधिक उम्र के बच्चों के लिए सामान्य बीपी 120/80 से कम माना जाता है।
High Blood Pressure in Kids know Symptoms and Risks
ब्लड प्रेशर की समस्या - फोटो : Freepik.com

बच्चों में हाई बीपी होने की दिक्कत क्यों होती है?

बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सामान्य तौर पर अधिक वजन, ज्यादा नमक वाला खाना खाना, नियमित व्यायाम की कमी और परिवार में हाई बीपी की हिस्ट्री बच्चों के जोखिमों को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा किडनी की बीमारी, हृदय की कुछ समस्याएं, हार्मोन संबंधी गड़बड़ियां और कुछ दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं।
 

  • खास बात यह है कि छोटे बच्चों में हाई बीपी होने पर किसी अंदरूनी बीमारी के खतरों पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है।
  • इसे केवल मोटापे या खानपान के कारण होने वाली समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
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बच्चों में दिल की बीमारियों का खतरा - फोटो : Adobe Stock Photos

बच्चों में हाई बीपी के क्या खतरे हैं?

अगर लंबे समय तक ब्लड प्रेशर बढ़ा रहे, तो इसका असर हृदय, किडनी और रक्त वाहिकाओं पर पड़ सकता है। बचपन में हाई बीपी आगे चलकर भी हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकती है। कुछ बच्चों में सिरदर्द, चक्कर या धुंधला दिखाई देने जैसी शिकायतें हो सकती हैं, लेकिन अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, तीन साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों का ब्लड प्रेशर नॉर्मल हेल्थ चेकअप के दौरान साल में कम से कम एक बार जरूर चेक करना चाहिए। अगर बच्चे को मोटापा, किडनी की बीमारी, डायबिटीज है या वह ऐसी दवाएं ले रहा है जिनसे बीपी बढ़ सकता है, तो डॉक्टर से मिलकर समय-समय पर बीपी टेस्ट कराते रहना चाहिए।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: ये रूपायन में प्रकाशित कंटेट है। अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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