कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए देश में घोषित लॉकडाउन का लोग कलात्मक और रचनात्मक उपयोग कर रहे हैं। योग, व्यायाम, बागवानी, पेंटिंग, संगीत से लेकर अपने तरह-तरह के शौक पूरे करने में लोग क्वालिटी टाइम बिता रहे हैं। आप भी ऐसा कुछ कर रहे होंगे। रचनात्मकता से भरी ऐसी ही प्रेरणादायक गतिविधियों को देश-दुनिया के साथ साझा करने के लिए अमर उजाला ने अपने पाठकों से इस बारे में तस्वीरें और वीडियो साझा करने की अपील की थी। इस दौरान कई पाठकों ने हमें बताया कि वे इस समय का कैसे सदुपयोग कर रहे हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर अमेरिका तक के पाठकों के ईमेल हमें प्राप्त हुए। आइए, आपको भी दिखाते हैं कि लॉकडाउन के दौरान घर में रहते हुए वे कैसे क्वालिटी टाइम बिता रहे हैं और दूसरों को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे हैं:
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Lockdown
- फोटो : Amar Ujala
लॉकडाउन के दौरान बहुत से लोग क्रिएटिविटी को पूरा समय दे रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं- शिवांशी सिंह, जो आर्ट एंड क्राफ्ट से काफी खूबसूरत चीजें तैयार कर रही हैं। इनमें सजावट के आइटम से लेकर खिलौने तक शामिल हैं। वे दूसरों से भी ऐसा करने की अपील कर रही हैं।
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Lockdown
- फोटो : Amar Ujala
लॉकडाउन के दौरान बहुत से लोगों को समय किचन में भी गुजर रहा है। अमित कुमार भी अपने एक मित्र के साथ खाने बनाने के गुर सीख ओर सिखा रहे हैं। वहीं धीरेंद्र भारती ने भी किचन में भोजन बनाते अपनी तस्वीरें शेयर की है। लोगों का कहना है कि किचन में अलग-अलग रेसिपी बनाने की कोशिश करने का यह सही समय है। अतिथि को तो खिलाना नहीं है कि खराब बनने की चिंता रहे। सीख जाएंगे तो लॉकडाउन के बाद अतिथियों और मित्रों को खिलाएंगे।
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Music in Lockdown
- फोटो : Amar Ujala
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रिंस शर्मा लिखते हैं कि वह इस समय का उपयोग अपनी गायकी को बेहतर बनाने में बिता रहे हैं। इन दिनों उन्हें रिहर्सल का खूब समय मिल रहा है। उनका परिवार भी उनकी गायकी का आनंद ले रहा है। वाराणसी निवासी शिक्षक सूर्यदीप कुशवाहा अपने बच्चें अनमोल और अभिनव को खूब समय दे रहे हैं। वहीं, मनोहर चामोली भी अपने बच्चे के साथ सोशल मीडिया पर संदेश दे रहे हैं।
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Prakash Upreti
- फोटो : Amar Ujala
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक डॉ. प्रकाश उप्रेती इन दिनों अपना ज्यादातर समय किताबें पढ़ने में दे रहे हैं। वह कहते हैं कि कोई लक्ष्य नहीं है, जब तक मजा आता रहेगा, पढ़ता रहूंगा। मेरी समझ कहती है कि किताब को पढ़ने से ज्यादा उसे गुनना चाहिए। इसमें समय लगता है। इधर मैंने निर्मला जैन की आत्मकथा 'ज़माने में हम' विजय त्रिवेदी की 'बीजेपी कल, आज और कल', शेखर पाठक की उत्तराखंड में जंगलों को लेकर उठी आवाजों पर केंद्रित 'हरी भरी उम्मीद' और आईटीबीपी में कार्यरत कमलेश कमल की किताब 'ऑपरेशन बस्तर(प्रेम और जंग)' पढ़ी हैं। अब श्रीनिवासन श्रीकांत के संपादन वाली 'कथा में पहाड़' उसी को पढ़ रहा हूं। एक किताब को खत्म करने के बाद, कुछ दिन उसके साथ बने रहना चाहिए। इसलिए किताबें पढ़कर खत्म कर देना मेरा कोई लक्ष्य नहीं है। पढ़ना नियमित कर्म और अभ्यास है।