बच्चों की देखभाल शुरुआती दिनों में जितनी बेहतर की जाए, उनका आगे का जीवन उतना ही बेहतर और रोगमुक्त हो सकता है। नवजात अवस्था या गर्भावस्था के दौरान की गई छोटी से छोटी चूक भी बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। हाल ही में हुए एक अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने बताया है कि गर्भाशय और शैशवावस्था में जिन बच्चों को एंटीबायोटिक दवाएं ज्यादा दी जाती हैं, ऐसे बच्चों में आगे चलकर कई प्रकार की एलर्जी के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली में कमजोरी आ सकती है। जन्म के छह माह के भीतर ही ऐसे बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली में कमजोरी के लक्षण देखे जा सकते हैं।
आइए जानते हैं इस अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने और किन बातों को लेकर लोगों को सावधान किया है।
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antibiotics tablets
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'एमबियो' नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में विशेषज्ञों ने बताया है कि नवजातों को ज्यादा एंटीबायोटिक दवाएं देने से उनके बृहदान्त्र में नियामक टी-कोशिकाओं को क्षति पहुंचती है। इसके कारण आने वाले समय में एलर्जी के प्रति बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है जिससे अस्थमा, सांस संबंधी एलर्जी, सीलिएक, एक्जिमा आदि बीमारियां होने लगती हैं।
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एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग आंतों के माइक्रोबायोटा को बाधित करता है
पहले के अध्ययनों में भी वैज्ञानिक बताते रहे हैं कि जीवन के शुरुआती दिनों में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग आंतों के माइक्रोबायोटा को बाधित करता है। माइक्रोबायोटा, हमारे शरीर में मौजूद सूक्ष्मजीव होते हैं। ये प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाए रखने के साथ शरीर को तमाम प्रकार के रोगों जैसे मोटापे और आंत में सूजन आदि से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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शोधकर्ताओं ने चूहों पर यह अध्ययन किया है। इसमें भ्रूण और नवजातों को एंटीबायोटिक दवाएं देकर आने वाले दिनों में इसके प्रभावों को देखा गया। इस अध्ययन के दौरान यह जानने की कोशिश की गई कि इन दवाओं का असर शरीर में मौजूद माइक्रोबायोटा को किस प्रकार से प्रभावित करता है।
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एंटीबायोटिक दवाएं
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इस शोध से जुड़े शोधकर्ता और रटगर्स के सेंटर फॉर एडवांटेड बायोटेक्नोलॉजी एंड मेडिसिन के निदेशक मार्टिन ब्लेसर ने बताया कि एंटीबायोटिक्स का प्रयोग शरीर में मौजूद माइक्रोबायोम पर असर डालता है, जिसका असर बच्चों में वयस्कता तक बना रह सकता है। ऐसे बच्चों को अक्सर एलर्जी से संबंधित रोगों का शिकार पाया जाता है।