चार दशकों से कैमरे के आगे अपनी अनोखी ऊर्जा के साथ सक्रिय अनिल कपूर अगले महीने 63 साल के हो जाएंगे। उनसे मिलना हमेशा सिनेमा को समझने जैसा होता है। हिंदी सिनेमा में उनके निभाए लखन, मुन्ना, शिवाजी राव और प्रेम प्रताप पटियाले वाले जैसे किरदार मसाला फिल्मों का अध्ययन करने वालों के लिए दिलचस्प विषय रहे हैं। अनिल कपूर से एक खास मुलाकात।
Exclusive: अमर उजाला से बोले अनिल कपूर, जो कलाकार होते हैं वे आधे पागल होते हैं
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आप अपने सुपरस्टार के तमगे का क्रेडिट किन लेखकों के साथ बांटना चाहेंगे?
जावेद (अख्तर) साहब और के भाग्यराज मेरे करियर के वे लेखक हैं जिन्होंने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने में बहुत ही बड़ा योगदान दिया है। बिना लेखक के किरदार में जान नहीं आती है और जब तक फिल्म का हीरो जानदार नहीं होता, लोगों को फिल्म पसंद नहीं आती। तो एक मजबूत किरदार के लिए मैं हमेशा फिल्म के लेखक को तवज्जो देता हूं और उसकी इज्जत भी करता हूं।
लोगों का सुझाव है कि फिल्म कारोबार के आंकड़ों की ऑडिट किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए, आपका क्या मत है?
इन सब चीजों पर मैं इतना ध्यान नहीं देता। यह सब निर्माता, वितरक और स्टूडियो के मतलब की बात है। मैंने जब से करियर शुरू किया है तब से मैंने सिर्फ अपने काम पर ही ध्यान दिया है। मेरा ध्यान हमेशा इस बात पर रहता है कि अपने किरदार को कैसे बेहतर बनाना है। मैंने कभी कॉमर्स को नहीं बल्कि कॉमर्स ने मुझे फॉलो किया है।
पहले के जमाने में फिल्म प्रमोशन के समय अगर सोशल मीडिया होता तो क्या फायदा और नुकसान हो सकता था?
अगर पहले के समय में भी आज जैसे ही प्रमोशन के तरीके होते तो उसका फायदा और नुकसान दोनों ही हो सकता था। नुकसान यह होता कि जब तक दुनिया को कुछ पता चलता कि फिल्म कैसी है तब तक वह फिल्म पैसे कमा कर निकल जाती। वहीं फायदा यह होता कि उस समय की ऐसी फिल्में रहीं जो सिर्फ शहरों तक ही सीमित रहीं, उन्हें दूर दराज के इलाकों तक पहुंचाया जा सकता था। मेरी ही तमाम फिल्में ऐसी हैं जिन्हें अगर दर्शकों का विस्तार मिलता तो उनकी पहुंच और उनका असर दूर तक हो सकता था। इन फिल्मों में
जैसे वो सात दिन, साहेब और लम्हे। अगर इन फिल्मों के समय सोशल मीडिया होता तो यह फिल्में दूर दराज इलाकों में अधिक मात्रा में पहुंचती और अधिक सफल होती।
आपके करियर में गेंम चेंजर फिल्म कौन सी रही है?
वो सात दिन मेरी जिंदगी में एक ऐसी फिल्म रही जिसने मुझे सिनेमा जगत के सभी फिल्मकारों की नजरों में पहुंचाया।
आपने अपनी जिंदगी में सबसे अधिक पागलपंती का कौन सा काम किया है?
कुछ ना कुछ तो मैं रोज कर ही देता हूं। दरअसल जो कलाकार होते हैं वे आधे पागल होते हैं। तो वह कुछ ना कुछ पागलपंती करते ही रहते हैं। अगर हम आधे पागल ना हों तो सालों तक इस तरह से काम नहीं कर सकते हैं।