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इतिहास के इन 10 योद्धा घोड़ों की तरह 'शक्तिमान' को नहीं भुला पाएगी दुनिया
Thu, 21 Apr 2016 07:29 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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Updated Thu, 21 Apr 2016 07:29 PM IST
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घोड़े जो योद्धा कहलाए
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पुलिस के घोड़े शक्तिमान के दम तोड़ने से पशुप्रेमियों की आंखें नम हैं। एक नेता की क्रूरता का शिकार हुआ जांबाज घोड़ा शक्तिमान अब चंद स्मारकों, जगहों के नामकरणों और समय के साथ धुंधली होने वाली यादों में बचा रह जाएगा। देखा जाए तो दुनिया के आरंभ से ही पशुओं और इंसानों की दोस्ती रही है। खासकर वर्चस्व की लड़ाईयों में घोड़ों ने इंसानों का बखूबी साथ दिया। शक्तिमान भी ऐसे चंद जांबाज घोड़ों में से एक था। उसकी शहादत पर समर्पित इतिहास के उन घोड़ों को फिर से याद कर लेते हैं जिनकी टापों से जंगल, पहाड़, ऊची चट्टानें भी दहल गईं। जिन्होंने युद्धों को जीतने में अहम भूमिका निभाई।
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चेतक
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युद्ध के जांबाज घोड़ों का जिक्र होगा तो कोई राजपूत शासक महाराणा प्रताप के चेतक को नहीं भुला सकता। इंतिहास के पन्नों, दंतकथाओं और किवदंतियों पर गौर करें तो चेतक हवा से बातें करता था। 21 जून 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक जख्मी हो गया था जिससे उसकी मौत हो गई। युद्ध राजपूतों और मुगलों के बीच लड़ा गया था। बाद में महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी में चेतक का स्मारक बनवाया। इसे आज भी राजस्थान के राजस्मंद में देखा जा सकता है। चेतक आज भी कविताओं, कहानियों और लड़ाई के अमर कथाओं में जिंदा है। अंग्रेजी में चेतक 'ब्लू हॉर्स' के नाम से भी मशहूर है।
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सरजेंट रैकलैस
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तस्वीर मादा घोड़े यानी एक घोड़ी की है। नाम है सरजेंट रैकलैस। मंगोलियन ब्रीड की रैकलैस को साल 1952 अमेरिका ने अपनी सेना में शामिल किया। कोरिया से युद्ध के दौरान और साल 1953 में आउटपोस्ट वेगस के युद्ध के दौरान रैकलैस ने घायलों और असलहों को ढोने में जबरदस्त साहस और क्षमता का परिचय दिया। एकबार एक दिन में रैकलैस ने अकेले ही 51 फेरे लगा डाले। रैकलेस को सरजेंट की उपाधी से सम्मानित किया गया और साल 1954 में वो रिटायर हो गई। अमेरिका की लाइफ मैगजीन ने रैकलैस को अमेरिका के आल टाइम 100 हीरो में शामिल किया था। साल 1968 में रैकलैस ने दुनिया को अलविदा कहा।
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कोमांचे
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रैकलैस की तरह जांबाज घोड़े कोमांचे को साल 1968 में अमेरिका सेना में शामिल किया गया। कोमांचे योगदानों को देखते हुए साल 1887 में सेकेंड कमांडिंग ऑफिसर का दर्जा दिया गया। साल 1891 में जब कोमांचे दुनिया से रुख्सत हुआ तो पूरे सम्मान के साथ उसका सैन्य अंतिम संस्कार किया गया।
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सिनसिन्नाटी
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अमेरिकी सेना में ही शामिल सिनसिन्नाटी अपनी रफ्तार की वजह से लोकप्रिय हुआ।
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