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लेडीज पार्लर चलाने वाले पुरुष की आपबीती सुनेंगे तो भावुक हो जाएंगे आप

Sat, 02 Feb 2019 07:19 PM IST
विजय जैन बीबीसी
बीबीसी Published by: विजय जैन Updated Sat, 02 Feb 2019 07:19 PM IST
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Story of a men who runs ladies beauty parlour
उत्तराखंड के छोटे शहर रुड़की में शायद मैं पहला या दूसरा मर्द था - फोटो : social media
उत्तराखंड के छोटे शहर रुड़की में शायद मैं पहला या दूसरा मर्द था जिसने कोई लेडीज पार्लर खोला थामेरी इस च्वाइस पर मेरे जानने वाले तो नाक-भौंह सिकोड़ते ही थे, महिला कस्टमर्स में भी हिचकिचाहट थी।पड़ोसी तरह-तरह की बातें बनाया करते और कहते कि लेडीज पार्लर तो लड़कियों का काम है लड़कियों को मनाना, उनका विश्वास जीतना और यह बताना कि मैं भी किसी लड़की से कम अच्छा मेकअप नहीं कर सकता, बहुत मुश्किल था, अगर कोई लड़की मेरे पार्लर में आती भी थी तो उनके पति, भाई या पिता मुझे देखकर उन्हें रोक देते, वो कहते, अरे यहां तो लड़का काम करता है।

लड़कियां मुझसे थ्रेडिंग तक करवाने से साफ इनकार कर देती। 8X10 के कमरे में शायद एक लड़के का उनके करीब आकर काम करना उन्हें असहज करता था, सवाल मेरे जहन में भी थे। क्या लड़कियां मुझसे उतना ख़ुल पाएंगी जैसे एक पार्लर वाली लड़की को अपनी पसंद-नापसंद बता पाती हैं।
Story of a men who runs ladies beauty parlour
mens ladies beauty parlour

ऐसा नहीं कि मुझे इस सबका अंदाजा नहीं था, लेकिन जब अपने मन के काम को बिजनेस में बदलने का मौका मिला तो मैं क्यों छोड़ता? शुरुआत दरअसल कई साल पहले मेरी बहन की शादी के दौरान हुई।उसके हाथों में मेहंदी लगाई जा रही थी और वो मेहंदी लगाने वाला एक लड़का ही था बस लड़कपन की उस शाम मेरे दिलो-दिमाग में मेंहदी के वो डिजाइन रच-बस गए कोन बनाना सीखा, कागज पर अपना हाथ आजमाया और फिर मैं भी छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में मेहंदी लगाने लगा कुछ दिन बाद जब घर पर इस बारे में पता चला, तो खूब डांट पड़ी।

Story of a men who runs ladies beauty parlour
mens ladies beauty parlour - फोटो : social media
पापा ने सख्त लहजे में कहा कि मैं यह लड़कियों जैसे काम क्यों कर रहा हूं, वो चाहते थे कि मैं उन्हीं की तरह फौज में चला जाऊं लेकिन मुझे फौज या कोई भी दूसरी नौकरी पसंद ही नहीं थी,फिर एक बार मैं एक शादी में गया और वहां मैंने औरतों के हाथों में मेहंदी लगाई जो काफी पसंद की गई, इसके एवज में मुझे 21 रुपए मिले, मेरी जीवन की ये पहली कमाई थी। मेरी मां और भाई-बहन मेरे शौक को पहचान चुके थे, लेकिन पापा को ये अब भी नागवारा था, हारकर मैं हरिद्वार में नौकरी करने लगा।सुबह नौ से पांच वाली नौकरी,सब ख़ुश थे क्योंकि मैं मर्दों वाला काम कर रहा था पर मेहंदी लगाने का शौक मेरे दिल के एक कोने में ही दफ्न होकर रह गया रह-रहकर एक हूक सी उठती कि इस नौकरी से मुझे क्या मिल रहा है।ना तो बेहतर पैसा ना ही दिल का सुकून।
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mens ladies beauty parlour - फोटो : social media

इस बीच लंबी बीमारी के बाद पापा चल बसे, घर का खर्च चलाने की जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई लेकिन, इसी जिम्मेदारी ने मेरे लिए नए रास्ते भी खोल दिए।मैं जब छुट्टी पर घर आता तो शादियों में मेहंदी लगाने चला जाता यहां मेरी महीने की तन्ख्वाह महज 1,500 रुपए थी, वहीं शादी में मेंहदी लगाने के मुझे करीब 500 रुपये तक मिल जाते थे शायद कमाई का ही असर था कि अब परिवार वालों को मेरा मेहंदी लगाना ठीक लगने लगा था उसी दौरान मुझे पता चला कि ऑफिस में मेरा एक साथी अपनी पत्नी के ब्यूटी पार्लर में उनकी मदद करता है, और दोनों अच्छा-खासा पैसा कमा लेते हैं।

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mens ladies beauty parlour

मन में कौंधा, की क्यों न मैं भी अपना एक ब्यूटी पार्लर खोल लूं लेकिन यह सुझाव जब मैंने अपने परिवार के सामने रखा तो एकाएक सभी की नजरों में बहुत से सवाल उठ खड़े हुए।वही लड़कियों का काम - लड़कों का काम वाले सवाल पर ठान लो तो रास्ते ख़ुल ही जाते हैं।

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