इटावा के करीमुद्दीन आसिफ, सीतापुर के मिर्जा वजाहत हुसैन चंगेजी और अमरोहा के सैयद अमीर हैदर कमाल नकवी। नाम पढ़ के कुछ याद आया क्या? चलिए इनके नाम फिर से लिखते हैं, के आसिफ, वजाहत मिर्जा और कमाल अमरोही। इन तीनों के नाम हर बार लोगों को तब जरूर याद आते हैं, जब बात होती है हिंदी सिनेमा की सबसे नायाब फिल्म ‘मुगल ए आजम’ की। के आसिफ की बरसों की मेहनत से साकार हुई ये फिल्म बंटवारे से पहले बननी शुरू हुई। इसके प्रोड्यूसर बदले। इसकी पूरी कास्ट बदली लेकिन न बदली तो के आसिफ की जिद। और, ये इसके बावजूद कि फिल्म की कहानी लीक होने के बाद तकरीबन इसी कहानी पर एक फिल्म बनकर रिलीज हुई और सुपरहिट भी हो गई।
Lucky Date Of Hindi Cinema: अगस्त की पांचवी तारीख को रिलीज हुईं ये फिल्में, बॉक्स ऑफिस सफलता में बनाए रिकॉर्ड
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मुगल ए आजम
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सन 60 में बिकी सौ रुपये की टिकटें
जिस जमाने में पौने पांच रुपये का एक डॉलर हुआ करता था, उस जमाने में सिनेमा की टिकट रूपये, डेढ़ रुपये की हुआ करती थी। लेकिन, ‘मुगल ए आजम’ की टिकट सिर्फ टिकट नहीं यादों का पूरा गुलदस्ता होता था। इसमें फिल्म की एक टिकट होती, फिल्म के फोटोग्राफ्स होते, फिल्म के गानों की बुकलेट होती और होतीं दूसरी कई यादगार चीजें। और कीमत, पूरे सौ रुपये। जी हां, सुनकर आप चौंक सकते हैं कि भला सन 60 में सौ रुपये की सिनेमा टिकट किसने खरीदी होगी। तो जनाब जान लीजिए कि फिल्म की एडवांस बुकिंग जिस दिन खुली उस दिन आसपास के शहरों के लोग भी बंबई पहुंच गए थे मराठा मंदिर के सामने फिल्म की टिकट के लिए लाइन लगाने।
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मुगल ए आजम
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हाथियों पर लाया गया फिल्म का प्रिंट
बवाल हो गया था मुंबई में ‘मुगले ए आजम’ का सिनेमाघरों में रिलीज होना। किसी फिल्म का एक साथ देश के डेढ़ सौ सिनेमाघरों में रिलीज होना उस वक्त का रिकॉर्ड था। मराठा मंदिर इस फिल्म के लिए ही रंग रोगन करके फिर से चमकाया गया था। प्रीमियर पर प्रिंट हाथियों पर लदकर आया। सिनेमा के बाहर भव्य सेट सा बनाया गया। फिल्म के पोस्टर एक जैसे ही रंगे जाएं इसके लिए के आसिफ ने उन दिनों की एक मशहूर पेंट कंपनी का पूरा स्टॉक खरीद लिया था।
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मुगल ए आजम
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पहले दिन ही बिक गए महीने भर के टिकट
इधर, मराठा मंदिर में एक शो में हजार लोगों से कुछ ही ऊपर लोगों के बैठने की जगह थी और बाहर टिकट खरीदने वाले इकट्ठा हो गए थे कोई एक लाख। थिएटर वालों को पुलिस बुलानी पड़ी। लेकिन लोग भागे नहीं। वहीं डटे रहे। दिन में चार शोज में चार हजार, हफ्ते के 28 हजार के हिसाब से चार हफ्तों के टिकट बिके और उसके बाद अगले एक महीने तक थिएटर पर बुकिंग ही बंद रही। ‘मुगल ए आजम’ की रिलीज के समय ये भी भारत में हो चुका है कि लोग तीन चार दिन तक लाइन में लगे रहे। घर से खाना बनकर आता। रिलीवर फ्रेश होने के लिए रिलीव करता और लोग फिर आकर लाइन में लग जाए।
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मुगल ए आजम
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
एक साथ तीन भाषाओं में हुई शूटिंग
फिल्म ‘मुगल ए आजम’ हिंदी सिनेमा के लिए एक फिल्म नहीं बल्कि कहानी है। हिंदुस्तानी (हिंदी व उर्दू) के अलावा अंग्रेजी और तमिल में भी फिल्म की शूटिंग होनी तय हुई थी। हर सीन तीन बार शूट होता। लेकिन जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई। अकबर के नाम से रिलीज फिल्म का तमिल संस्करण फ्लॉप रहा और के आसिफ ने इसके बाद उन सारे अंग्रेज एक्टर्स को वापस भेज दिया, जिन्हें उन्होंने मुंबई बुलाया था इस फिल्म की डबिंग करने के लिए। के आसिफ ने फिल्म पर दिल खोलकर पैसा बहाया। लेकिन फिल्म मे काम करने वाले कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें पैसा काटता था, जैसे कि संगीतकार नौशाद।