रविवार 5 जून, 2022 को पूरी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाती है। साल 1972 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने स्टॉकहोम कॉन्फ्रेंस के समय इस दिवस को मनाने की घोषणा की थी। यह पर्यावरण संरक्षण को लेकर पहला सम्मेलन था। इसके बाद साल 1974 से हर साल पूरी दुनिया इस तारीख को पर्यावरण दिवस के नाम से जाना जाता है। इस दिवस को घोषित करने का उद्देश्य पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक बनाना और जिम्मेदारियों का एहसास कराना है।
Environment Day 2022: किसी ने आंदोलन चलाया तो किसी ने पेड़ों को बनाया अपनी संतान, जानें इन पर्यावरण संरक्षकों को
पर्यावरण दिवस के न आने से पहले और इसके आने के बाद भी भारत में कई ऐसे लोग थें और हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया।
सुंदर लाल बहुगुणा
सुंदरलाल बहुगुणा को चिपको आंदोलन के प्रणेता और देश के सबसे प्रमुख पर्यावरणविद के रूप में जाना जाता है। उन्हें पर्यावरण और वृक्षों की रक्षा के लिए दुनियाभर में ख्याति मिली। लोगों ने उन्हें वृक्ष मित्र का भी नाम दिया था। सुंदर लाल बहुगुणा का जन्म साल 1927 में टिहरी गढ़वाल में हुआ था। साल 1980 की शुरुआत में उन्होंने पूरे गढ़वाल क्षेत्र का दौरा किया और वृक्षों और पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम किया। सुंदरलाल बहुगुणा ने प्रसिद्ध टिहरी डैम का भी विरोध किया था। उनका मानना था कि उत्तराखंड भूकंप प्रभावित क्षेत्र में आता है और इस डैम का निर्माण घातक हो सकता है। भारत सरकार ने सुंदरलाल बहुगुणा को साल 1981 में पद्मश्री और साल 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। साल 2021 में बहुगुणा ने दुनिया को अलविदा कह दिया था।
तुलसी गौड़ा
कर्नाटक के हलक्की स्वदेशी जन-जाति से ताल्लुक रखने वाली तुलसी गौड़ा को आज पूरी दुनिया जानती है और अपना आदर्श मानती है। 72 साल की तुलसी को इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट कहा जाता है। इसका कारण उनके पास में पेड़- पौधों और वनस्पति का ज्ञान है। 12 वर्ष से ही पौधारोपण कर रही तुलसी ने अब तक 30 से 40 हजार की संख्या में पेड़ लगाए हैं। उन्हें साल 2021 में भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया। पद्म सम्मान को प्राप्त करने के लिए तुलसी अपने पारंपरिक आदिवासी लिबास में ही नंगे पैर राष्ट्रपति भवन पहुंचीं थी। यह समारोह में आकर्षण का प्रमुख केंद्र था।
सालुमारदा थिम्मक्का
मूल रूप से कर्नाटक के तुमकुर जिले की रहने वाली सालुमारदा थिम्मक्का आज देश के लिए प्रेरणा हैं। आपको यहा जान कर के आश्चर्य होगा कि इनकी उम्र 110 साल है और ये बीते 80 सालों से वृक्षारोपण का कार्य कर रही हैं। थिम्मक्का बरगद के पेड़ों को अपना संतान मानती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी अपनी कोई संतान नहीं हैं। उन्होंने 8 हजार से भी अधिक पेड़ लगाएं हैं। इनमें करीब 375 बरगद के पेड़ हैं। साल 2019 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। खुद देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया था।
मेधा पाटकर
देश में पर्यावरण संरक्षण की बात जब भी आती है तो मेधा पाटकर का नाम सूची की अग्रिम पंक्ति में आता है। साल 1979 में सरकार ने नर्मदा और सहायक नदियों पर बांध बनाने का फैसला लिया। इस फैसले से हजारों की संख्या में लोगों को विस्थापन और पुनर्वास की समस्या का सामना करना पड़ा। इसके खिलाफ मेधा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत की। देखते-देखते उनका यह आंदोलकन जन-जन तक लोकप्रिय हो गया। आज के समय में भी देश में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के किसी फैसले पर आवाज उठाने वालों में मेधा का नाम सबसे आगे होता है।
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