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प्राकृतिक आपदाएं और सरकारें: गलतियों से सबक लेना कब सीखेंगे हम?

Thu, 04 Mar 2021 01:41 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 04 Mar 2021 01:41 PM IST
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uttarakhand disaster 2021 reasons causes in hindi 2013 disaster in uttarakhand
अगर सबक सीखा होता तो यह नौबत शायद न आती - फोटो : social media

भारत-तिब्बत सीमा से लगी नीती घाटी में 7 फरवरी की जल प्रलय के बाद ऋषि गंगा के मुहाने पर एक दैत्याकार झील के प्रकट होने के बाद इस नवीनतम आपदा ने केदारनाथ की 2013 की महाआपदा की भयावह यादें ताजा कर दी हैं। उस समय भी सूची केदार घाटी को तबाह करने के लिए चोराबारी ताल के टूटने को जिम्मेदार माना गया था। उस समय पर्यावरणवादियों के साथ ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की 2013 की उत्तराखंड आपदा पर तैयार अध्ययन रिपोर्ट में भी योजनाकारों और निर्णयकर्ताओं को केदारनाथ आपदा से सबक सीखने को कहा गया था।

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अगर सबक सीखा होता तो यह नौबत शायद न आती। आपदा के बाद अब राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) द्वारा बाढ़ग्रस्त प्रोजेक्ट की मालिक एनटीपीसी पर 58 लाख का जुर्माना ठोके जाने से साबित होता है कि सरकारी कंपनियां भी संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा का कारण बन रही हैं।

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  • आपदा प्रबंधन संस्थान ने 2013 में सावधान किया था

दुनिया को दहलाने वाली 16-17 जून 2013 की केदारनाथ आपदा के कारणों का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआइडीएम) की टीमों ने स्वयं दो बार आपदाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करने के साथ ही रिमोट सेंसिंग, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियाॅलाजी, राज्य आपदा न्यूनीकरण केंद्र और भूगर्व सर्वेक्षण विभाग जैसी विभिन्न विशेषज्ञ ऐजेंसियों के सहयोग से तीन खंडों में अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। जिसमें केदारनाथ आपदा से सबक लेने के लिए 19 सिफारिशें और चेतावनियां दीं गईं थीं। इनमें भी जलविद्युत परियोजनाओं को ज्यादा फोकस कर कहा गया था कि जलविद्युत परियोजनाओं से सदैव पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ ही स्थानीय समुदाय को त्वरित बाढ़, जमीन धंसने, जल श्रोत सूखने और जनजीवन प्रभावित होने के साथ ही वन्य जीवन और पर्यावरण दूषित होने की शिकायतें भी रही हैं। 

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  • बिजली परियोजनाओं से खतरे की अनदेखी

रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आंकलन बाध्यकारी होना चाहिए। इन परियोजनाओं की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) में सुरंगों तथा अन्य क्षेत्रों से पहाड़ काट कर निकले मलबे के निस्तारण का भी स्पष्ट प्लान होना चाहिए। जिसमें मलबा निस्तारण के उचित स्थान और मलबे को निस्तारण स्थल तक पहुंचाने का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए तथा डम्पिंग जोन को नदी क्षेत्र से काफी दूर होना चाहिए। इसमें डम्पिंग स्थल पर सुरक्षा दीवार जरूरी बताई थी ताकि बरसात में मलबा न बह सके? क्योंकि इस मलबे से नदी में त्वरित बाढ़ आने के साथ ही नदी की दिशा भटक जाती है जो कि भूस्खनों को भी जन्म देती हैं।


रिपोर्ट में कहा गया था कि केदारनाथ की बाढ़ में श्रीनगर में 330 मेगावाट की परियोजना और चमोली जिले में 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजनाओं के मलबे ने बाढ़ की विभीषिका को कई गुना बढ़ाया है, जिसकी चपेट में श्रीनगर गढ़वाल स्थित एस.एस.बी. का प्रशिक्षण केंद्र सहित कई क्षेत्र आये हैं और पौराणिक गांव पाण्डुकेश्वर पर मंडरा रहा है।

रिपोर्ट में उत्तराखंड फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट-2012 का सख्ती से पालन न होने के के लिए विष्णुप्रयाग में बीच अलकनंदा में मंदिर बनाए जाने का उदाहरण दिया गया था। इसी रिपोर्ट में उत्तरकाशी जिले में असीगंगा की 2012 की बाढ़ का भी उल्लेख किया गया था जिसमें 28 लोग मारे गए थे और कुल 85 गांवों के 1159 परिवार प्रभावित हुए थे।

उसी गंगा पर 27 मेगावाट क्षमता की चार परियोजनाएं बनीं जो कि 2012 और 13 में लगातार बाढ़ की चपेट में आती रहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने केदारनाथ आपदा के बाद ही उत्तराखंड के अति संवेदनशील क्षेत्रों में लगाई जा रही 24 परियोजनाओं पर रोक लगाई थी।

इसी माह 18 तारीख को एनजीटी ने बाढ़ग्रस्त तपोवन बिजली प्रोजेक्ट के निर्माण में गाद निस्तारण में की जा रही घोर लापरवाही पर राज्य प्रदूषण बोर्ड द्वारा के सरकार की कंपनी एनटीपीसी पर लगाए गए 58 लाख के जुर्माने को उचित ठहराए जाने से साबित हो गया है कि बिजली उत्पादन के नाम पर पर्यावरण के साथ की जा रही अपराधिक छेड़छाड़ में सरकारी कंपनियां भी पीछे नहीं हैं।

भारत सरकार के नियमों के अनुसार...

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chamoli disaster - फोटो : अमर उजाला
  • पर्यावरण क्लीयरेंस में छूट का दुरुपयोग

भारत सरकार के नियमों के अनुसार 25 मेगावाट से कम क्षमता की बिजली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय क्लीयरेंस की जरूरत नहीं है। इसी ढील का लाभ उठा कर सत्ता में बैठे लोग निजी कंपनियों से सांठगांठ कर अति संवेदनशील क्षेत्रों में भी प्रोजेक्टों की बंदरबांट करते रहे हैं।

उदाहरण यह कि सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को विकास के लिए आंबंटित कुल 33 नई परियोजनाओं में से 24 परियोजनाएं 25 मेगावाट से कम क्षमता की होने से स्वतः ही उन्हें अति संवेदनशील क्षेत्रों में भी पर्यावरणीय बंधनों से मुक्त करा दिया गया।

नवंबर 2010 में जब इसी तरह की 56 बिजली परियोजनाओं के आंवटन में भ्रष्टचार की शिकायत हाइकोर्ट तक पहुंची तो राज्य सरकार को कोर्ट में सुनवाई से पहले स्वयं ही सारे आबंटन रद्द करने पड़े थे।

वर्तमान में यमुना और टोंस पर 17 छोटी बड़ी परियोजनाऐं उत्पादनरत् हैं तथा 20 परियोजनाऐं प्रस्तावित हैं। अलकनंदा कैचमेंट में 6 परियोजनाएं चालू हैं और 8 निर्माणाधीन हैं। जबकि इसी क्षेत्र में 24 नई परियोजनाऐं विभिन्न विकासकर्ताओं को आवंटित की जा चुकी हैं। राज्य में इस समय कुल 37 परियोजनाएं उत्पादनरत् हैं और उनमें भी 18 परियोजनाएं निजी हाथों में हैं।

इनके अलावा वर्तमान में राज्य सरकार के उपक्रम यूजेवीएनएल को 2723.8 मेगावट क्षमता की 32, केन्द्रीय उपक्रमों को 5801 मेगावाट की 32 और निजी क्षेत्र की कंपनियों को 1360.8 मेगावाट की 33 परियोजनाऐं विकसित करने के लिये आवंटित की गई हैं।

इन 9885.6 मेगावाट की 97 आबंटित परियोजनाओं में से ही 24 को सुप्रीम कोर्ट ने रोका हुआ है। जिन्हें खुलवाने के लिए सरकार बिजली की किल्लत का हवाला देते हुए पूरा जोर लगा रही थी। 

  • चार धाम सड़क के लिए 50 हजार पेड़ों का सफाया

हिमालय की अत्यंत संवेदनशीलता को अनुभव करते हुए 2001 में इसरो ने देश के 12 विशेषज्ञ संस्थानों के 54 वैज्ञानिकों से उत्तराखंड का ‘लैंड स्लाइड जोनेशन एटलस’’ बनाया था जिसमें इसी चारधाम मार्ग पर सेकड़ों की संख्या में सुप्त और सक्रिय भूस्खलन चिन्हित किए गए थे। लेकिन इस सर्वेक्षण को नजरंदाज कर चारधाम ऑल वेदर रोड के नाम पर लगभग 50 हजार पेड़ काट दिए गए और कुल 826 किमी लंबे मार्ग पर पहाड़ों को बुरी तरह काट दिया गया। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप भी विलंब से ही हो सका। अब सेकड़ों सुसुप्त भूस्खलनों के सक्रिय होने की आशंका बढ़ गई है।

  • भूस्खलन जोनिंग मैप की अनदेखी

एनआइडीएम की रिपोर्ट में भूस्खलन जोनेशन मैपिंग का प्राथमिकता के आधार पर पालन, निर्माण कार्यों में विस्फोटों के प्रयोग पर रोक, सड़क निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर, ढलानों के स्थिरीकरण के ठोस प्रयास और ग्लेशियल लेक तथा नदी प्रवाह निगरानी का ठोस ढांचा तैयार करने की सिफारिश भी की गई थी।

अगर इन सिफारिशों पर ध्यान दिया जाता तो पहाड़ इस तरह नहीं काटे जाते और केदारनाथ जैसे संवेदनशील स्थान पर सीमेंट कंकरीट का इतना बड़ा ढांचा भी खड़ा नहीे किया जाता और अब ना ही एवलांच संभावित बदरीनाथ धाम की हजामत की तैयारी न होती।

  • हिमालयी आपदाओं में 4 गुना वृद्धि

पर्यावरण संबंधी अनुसंधानों में संलग्न संस्था ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायर्नमेंट एण्ड वाटर’ (सीईईडब्लु) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में 1970 की अलकनंदा बाढ़ के बाद त्वरित बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने, हिमनद झीलों के फटने और बिजली गिरने आदि आपदाओं में चार गुना वृद्धि हो गई है। इन आपदाओं के खतरे में राज्य के 85 प्रतिशत जिलों की 90 लाख से अधिक आबादी आ गई है। रिपोर्ट में इन आपदाओं का कारण पर्यावरण की उपेक्षा बताया गया है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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