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‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की जीत और उठते बड़े राजनीतिक सवाल

Sat, 22 Feb 2020 01:01 PM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sat, 22 Feb 2020 01:01 PM IST
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tukde tukde gang really a threat to indian democracy or is it just a rumor
क्या 'टुकड़े टुकड़े गैंग' शब्दावली मंत्रालय या कानून प्रवर्तन/खुफिया एजेंसियों से मिली किन्हीं विशिष्ट जानकारियों पर आधारित है। - फोटो : अमर उजाला

लोकसभा में 11 फरवरी, 2020 की कार्यवाही के रिकॉर्ड से लिया गया यह सवाल और जवाब यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और अन्य मंत्रियों सहित पूरी भाजपा पर दुखद टिप्पणी न भी हो, तो मजाक का स्रोत तो है ही:

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सवाल
(क) क्या गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) या केंद्र/राज्य की कोई कानून प्रवर्तन एजेंसी/पुलिस बल या किसी केंद्रीय या राज्य खुफिया ढांचे ने 'टुकड़े टुकड़े गैंग' नामक किसी संगठन की पहचान की है और उसे सूचीबद्ध किया है;
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(ख) क्या 'टुकड़े टुकड़े गैंग' शब्दावली मंत्रालय या कानून प्रवर्तन/खुफिया एजेंसियों से मिली किन्हीं विशिष्ट जानकारियों पर आधारित है;

(ग) क्या गृह मंत्रालय/एनसीआरबी या किसी अन्य कानून प्रवर्तन या खुफिया संगठन ने 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' के कथित नेताओं और सदस्यों की कोई सूची तैयार की है;
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(घ) क्या 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' के सदस्यों के खिलाफ गृह मंत्रालय या किसी अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसी/खुफिया तंत्र द्वारा कोई दंडात्मक कार्रवाई/ दंड  (आईपीसी या किसी अन्य अधिनियम की किस विशेष धारा के तहत) पर विचार किया गया है; और

(च) यदि ऐसा है, तो इससे संबंधित ब्योरे कहां हैं?


जवाब

(क) से (द) तक : किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी की ओर से सरकार को ऐसी कोई सूचना नहीं दी गई है।

देश तोड़ रहे हैं?
मई, 2019 में जब से भाजपा दोबारा सत्ता में आई है, अनेक भारतीयों को यह मानने के लिए राजी किया जा रहा है कि भारत की अखंडता खतरे में है और कई समूह सक्रिय रूप से देश को तोड़ने के काम में जुटे हुए हैं।

इन समूहों को अलग-अलग समय में भिन्न नाम दिए गए: नक्सली, माओवादी, इस्लामिक आतंकवादी, अर्बन नक्सल इत्यादि। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा आयोजित एक विरोध प्रदर्शन (जिसके कारण कन्हैया कुमार और अन्य तीन छात्र नेताओं के खिलाफ देशद्रोह का फर्जी आरोप लगाया गया) के बाद प्रदर्शनकारी छात्रों को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के रूप में चिह्नित किया गया।

यह नाम भाजपा की नीतियों और कार्रवाइयों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले हर समूह पर चस्पां कर दिया जा रहा है। राजनीतिक विमर्श में भी यह प्रवेश कर चुका है- दुखद है कि शहरी विदेश मंत्री एस जयशंकर तक इससे नहीं बचे। जिस तेजी के साथ विभिन्न समूहों पर इसे चस्पां किया गया, लोग यह मानने लग गए कि ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का अस्तित्व सचमुच में है और यह देश के लिए गंभीर और बढ़ता खतरा है।

विद्वान, अर्थशास्त्री, लेखक, कलाकार, छात्र, श्रमिक नेता, किसान, बेरोजगार युवा, महिलाएं और बच्चे और बेशक, विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं तक को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का सदस्य होने की पहचान मिली।

नागरिकता संशोधन कानून ( सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीए) के खिलाफ शाहीन बाग में धरना दे रही महिलाएं और बच्चे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के एकदम नए सदस्य हैं। यह सूची रोजाना बढ़ती जा रही है।

 

 

 
 

tukde tukde gang really a threat to indian democracy or is it just a rumor
दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने दो रैलियों को संबोधित किया और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ पर बरसे - फोटो : PTI

योजना में गड़बड़
हाल ही में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने दो रैलियों को संबोधित किया और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ पर बरसे। अखबारों, टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया साइट्स ने 'गैंग' की तस्वीरें चमकाईं। लेकिन एक गड़बड़ हो गई। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के लोग एक हाथ में राष्ट्रीय ध्वज और एक हाथ में भारत के संविधान की प्रति रखे हुए थे।

इसके अलावा वे बीच-बीच में पूरे उत्साह के साथ राष्ट्रगान भी गा रहे थे। लोगों के खिलाफ उतारा जा रहा गुस्सा और मीडिया में आई तस्वीरें और छवियां एक दूसरे के एकदम उलट थीं। लोगों का प्रत्येक वर्ग विश्वास करने लगता था कि वह क्या विश्वास करना चाहता है।

अब एक मंत्री का चौंका देने वाला बयान आया है। भाजपा का कोई भी नेता यह बताने के लिए सामने नहीं आया कि पिछले एक महीने के दौरान उन्होंने जो आरोप लगाए हैं और पिछले हफ्ते संसद में मंत्री द्वारा दिए गए बयान इतने असंगत क्यों हैं।

दक्षिणपंथी विचारधारा के बारे में कुछ भी असामान्य या स्वाभाविक रूप से गलत नहीं है। दक्षिणपंथी नेता जब अपने धर्म का राजनीतिकरण करते हैं और लोगों को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश करते हैं (मेरा धर्म बनाम तुम्हारा धर्म) केवल तभी संविधान का उल्लंघन होता है और सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है।

भाजपा ने यही किया है और उसने पिछले छह सालों में सरकार और अन्य राज्य संस्थानों में ऐसे व्यक्तियों को रखा है, जो न केवल धार्मिक हैं, बल्कि वे ऐसे व्यक्ति हैं, जो अपने धार्मिक विश्वासों को हथियार बनाकर समाज के बड़े हिस्से में लोगों में भय और अनिश्चितता फैलाएंगे। 

जैसा कि दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान की पूर्व प्राध्यापक डॉ. नीरा चंदोक ने लिखा है, 'धर्मनिरपेक्षता का मुकाबला राजनीतिक रंग देने वाली सत्ता से है, सत्ता का इस्तेमाल एक धार्मिक उद्घोष के लिए किया गया, धार्मिक पहचान सत्ता के रूप में...धर्मनिरपेक्षता राजकीय धर्म को राज्य को नियंत्रित करने से रोकने का एक प्रयास है। यह बिल्कुल अपरिहार्य था, क्योंकि देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था।'

लड़ाई धर्म के राजनीतिकरण और धर्मनिरपेक्ष संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने के बीच है। यह लड़ाई, दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, हैदराबाद पुणे, कोचि और अन्य कई छोटे शहरों और विश्वविद्यालयों तथा अन्य जगहों पर हो रही है।

इस लड़ाई को आगे बढ़ाने वाले लोग राजनीतिक दलों से स्वाभाविक रूप से जुड़े लोग नहीं हैं। इनमें महिलाएं और बच्चे हैं, जो कि सामान्य तौर पर घरों में रहते हैं, युवा हैं जो कि उत्तरोत्तर सरकारों से निराश हैं और विद्यार्थी हैं जो कि राजनीति को लेकर ही निंदक हो गए हैं। उन्होंने कड़कड़ाती ठंड, पानी की बौछारों, लाठियां यहां तक गोलियों (अकेले में उत्तर प्रदेश में पुलिस फायरिंग में 23 लोग मारे गए) का सामना किया।

दिल्ली के चुनाव ने भारत के लिए 'वियतनाम मोमेंट' (1960-70 के दशक में वियतनाम युद्ध के समय हुए प्रदर्शन) ला दिया है। इसमें महत्वपूर्ण जीत-और समता तथा धर्मनिरपेक्षता की पुष्टि-तब हुई जब दिल्ली के लोगों ने प्रचंड वोट दिए। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जीत गया! टुकड़े टुकड़े गैंग और मजबूत और तब तक आगे बढ़े जब तक वह अपने सांविधानिक लक्ष्यों को हासिल न कर ले!
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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