पाकिस्तान की बढ़ी कूटनीतिक ताकत, भारत के लिए बढ़ रही है चिंता
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परदे के पीछे कुछ तो जरूर घटा है। आर्थिक मृत्युशैय्या पर पड़े पाकिस्तान की धड़कनें अचानक सामान्य सी चलती दिखाई देने लगी हैं। दुनिया भर के वित्त चिकित्सक मरीज की इस हालत को देखकर हैरान हैं। पाकिस्तान की अप्रत्याशित परिपक्वता के पीछे कहीं अमेरिका का दोहरा चरित्र तो नहीं है। यह बात इन दिनों जानकारों को मथ रही है।
पेरिस में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की बैठक में तो पाकिस्तान को एक जीवनदान मिलना तय था। चीन इन दिनों संस्था का प्रमुख है, इसलिए उसके कार्यकाल में तो इस आतंकी मुल्क को ब्लैक लिस्ट करने का सवाल ही नहीं उठता था।
मलेशिया और तुर्की की कश्मीर नीति और पाक का साथ देने की नीति तो जग जाहिर थी, लेकिन बीते दिनों जिस तरह वे भारत के खिलाफ आक्रामक हुए हैं, वह चौंकाता है। अभी तक वे संभवतया इस कारण चुप थे कि पाकिस्तान की आबादी के बराबर मुस्लिम हिंदुस्तान में हैं और वे सुख से जी रहे हैं। भारत के लिए यह चेतावनी भरी घंटी है।
हमारी विदेश नीति हालिया वर्षों में पटरी से उतरी हुई है। इसे कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। एक ब्यूरोक्रेट भारत का विदेश मंत्रालय संभालने में कहां चूक कर रहा है इसकी पड़ताल भी होनी चाहिए।
चंद रोज पहले ही अमेरिका ने पाकिस्तानी सेना को प्रशिक्षण देने का करार किया था। उसके पहले अफगानिस्तान के मामले में भी उसने भारत के इस पड़ोसी देश पर भरोसा किया। अफगानिस्तान में लाइब्रेरी बनाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत को पहले ही अपमानित करने वाला बयान दे चुके हैं।
पाकिस्तानी मीडिया ने यह कहते हुए भारत का मखौल उड़ाया कि जितना उसने अफगानिस्तान में पुस्तकालय बनाने पर खर्च किया है, वह तो अमेरिका के उस देश पर हो रहे सिर्फ छह घंटे का खर्च है।
पाकिस्तानी मीडिया पर भरोसा करें तो ट्रंप ने प्रधानमंत्री इमरान खान को भरोसा दिया है कि वे भारत की पुछल्ला यात्रा के रूप में नहीं आना चाहते बल्कि पाकिस्तान के लिए अलग से संपूर्ण यात्रा बनाएंगे। याद रखना होगा कि चौदह साल से कोई अमेरिकी राष्ट्रपति पाकिस्तान नहीं आया है।
दूसरी तरफ दो साल में अमेरिका ने भारत को लगातार आर्थिक झटके दिए हैं। कुछ अवधि छोड़ दें तो सत्तर वर्षों में उसका पलड़ा पाकिस्तान की ओर अधिक झुका रहा है। यह अमेरिका ही था, जिसने साठ के दशक में कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में पाक का साथ दिया था। अब ट्रंप भले ही गुजरात में झूला झूलकर चले जाएं मगर उन पर यकीन करना भारत की एक और भूल होगी। वे सिर्फ व्यापारी हैं और अगला चुनाव जीतने के लिए इन दिनों भारत के गुजराती मतदाताओं का उपयोग करना चाहते हैं।
चन्द रोज पहले संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पाकिस्तान दौरे पर आए थे। वे पाकिस्तान के प्रति जिस तरह अभिभूत हुए, वैसा तो पूर्व में कोई महासचिव नहीं हुआ। कहा जा सकता है कि पाकिस्तान को इन दिनों अपनी विदेश नीति संचालन के लिए कोई शक्तिशाली दिमागी टॉनिक मिला है। वह ठीक वैसा ही बरताव कर रहा है, जैसा लंबे समय तक भारत करता रहा है। यह हिंदुस्तान के लिए एक और कड़ा संदेश है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।