प्रधानमंत्री मोदी की लद्दाख यात्रा और भारत का रुख
प्रधानमंत्री की अचानक लद्दाख यात्रा के कई मायने हैं। सहज शब्दों में तो यही कहा जा रहा है कि सेना और पारा मिलिट्री फोर्सेज के मनोबल को बढाने के लिए प्रधानमंत्री पूर्वी लद्दाख के नीमू सैनिक ठिकाने से सेना के जवानो से रुबरु हुए। लेकिन बात इतनी सहज नहीं हैं मन की बात में भी प्रधानमंत्री ने चीन की विस्तारवादी नीति और भारतीय जवानों की शहादत की चर्चा की थी। साथ में यह भी चेतवानी दी थी कि इसका बदला भारत जरूर लेगा।
जब लद्दाख में सेना को संबोधित किया, उसमें भी बिना चीन का नाम लिए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चीन की विस्तारवादी और हिंसक मानसिकता की बात कही। जबकि पूरी दुनिया विकास और शांति के लिए उदिग्न है, वहीं कुछ देश दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने की साजिश रच रहे हैं। चीन ने भारतीय प्रधानमंत्री की लद्दाख यात्रा को गंभीरता से लिया है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जहु लीजियन ने कहा कि दोनों देशो के बीच सैनिक, राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर की वार्ता चल रही है इसलिए शांति को बनाये रखना जरुरी है। अगर चीन की नीतियों को गलवान वैली संघर्ष के बीच समझने की कोशिश करेंगे तो इसके कई पहलू दिखाई देंगे।
पहला, कई दशकों से खासकर 2013 से जबसे शी जिनपिंग राष्ट्रपति बने हैं, तबसे उनकी कूटनीति का महत्वपूर्ण हथियार 'सलामी स्लैश' रहा है। यह तरकीब कूटनीति नहीं बल्कि चोरी मानी जा सकती है। प्राय: भारत के ग्रामीण इलाको में खेतों के मेड़ बनाते समय कई लालची किसान यह देखते है कि मेरा पड़ोसी तो शहरो में रहता है, मेड़ को उसकी तरफ खिसकाकर जमीन का कुछ हिस्सा हड़प लिया जाए। जब विवाद होगा और सरकारी तौर पर जांच पड़ताल होगी तो देखा जाएगा।
ठीक यही काम चीन अपने पड़ोसी देशो के साथ कई वर्षो से करता आ रहा है। गलवान वैली की उसकी चोरी पकड़ी गई और भारत ने कड़ा रुख अपनाया। पहले भारत के समझौतावादी नीति के कारण चीन की दादागिरी चल जाती थी, लेकिन इस बार पासा पलट गया। हिंसक झड़प में दोनों देशों के सैनिक हताहत हुए, चीन अपने आंकड़ों पर चुप्पी साधे रहा।
पिछले दो तीन वर्षो में चीन में एक नई कूटनीति की खूब चर्चा होती है, जिसे 'वोल्फ वारियर' कूटनीति के नाम से जाना जाता है। यह चीन के लोकप्रिय मूवी का हिस्सा है, जिसमें चीन की आक्रामकता को खूब बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया है। जहां भी कोई देश चीन की बातों में हामी नहीं भरता, चीन उसको तबाह करने की साजिश रचने लगता है।
कोरोना के दौर में चीन की आलोचना करने वाले देशों को चीन अपनी आर्थिक शक्तियों के बूते पर रौंदने की कोशिश करता दिखा। इसका दूसरा पहलू अपने पड़ोसी देशों के साथ अपनी मनमर्जी के आधार पर सीमाओं का नए तरीके से सीमांकन करना। इसी उदेश्य के साथ पीएलए की सेना गलवान वैली पहुंची थी।
उसे अंदाजा था कि पकड़े जाने के बाद हमारी वोल्फ कूटनीति इसे संभाल लेगी। लेकिन चीन को बिलकुल यह अंदेशा नहीं था कि भारत ईंट का जवाब पत्थर से देगाऔर इसको लेकर चीन के विरुद्ध एक गंभीर मुहिम की शुरुआत कर देगा।
अगर व्यापक दृष्टिकोण के साथ देखा जाए तो यह संघर्ष महज क्षेत्रीय संघर्ष भर नहीं है, बल्कि यह एशिया महादेश के भीतर नए भू-राजनीतिक परिभाषा को निर्धारित करने वाला है। जब शक्ति का हस्तांतरण अटलांटिक महासागर से हिंद महासागर में हो रहा है तो चीन एशिया का निष्कंटक मठाधीश बनने की बेताबी में है।
चीन की नजर में भारत एक सबल प्रतिद्वंदी हो सकता है। इसलिए उसकी जड़ को झकझोड़ने की कोशिश में लगा हुआ है। लेकिन चीन की दाल यहां गलने नहीं वाली, उसका पासा उल्टा ही पड़ गया। यहां यह भी जानना उतना ही जरुरी है कि चीन की मंशा क्या थी? चीन इस फिराक में था कि कोरोना की मार में भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से झुलसी हुई है, जिसका फायदा उठाकर सीमा विवाद का मसला ही खत्म कर देते हैं।
याद होगा कि साल 1960 में माओत्से तुंग की सलाह पर चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भारत आए थे। दबाव बनाया था कि अक्साई चिन वाला एरिया चीन को दे दिया जाए, बदले में चीन अरुणाचल को भारत का अभिन्न अंग मान लेगा, लेकिन नेहरू जी ने बात नहीं मानी। उसके बाद से चीन पैकेज डील की तरह सीमा समझौते की जिरह करता है।
दरअसल यह चीन की एक सोची समझी चाल है। चीन अक्साई चिन को हड़पने के बाद अरुणाचल पर अपना दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। चूंकि पश्चिमी क्षेत्र भारत की संप्रभुता के लिए इतना अहम बन गया है कि किसी भी दम पर भारत इसको छोड़ नहीं सकता। अक्साई चिन के बाद चीन लद्दाख को अपनी गिरफ्त में लेना चाहता है।
चूंकि पीओके का क्षेत्र जम्मू कश्मीर का हिस्सा है, तो ऐसे में अगर चीन अक्साई चिन को अपने कब्जे में ले लेता है तो पीओके भारत के नक्शे से बाहर चला जाएगा। इतना ही नहीं पूरी तरह से जम्मू कश्मीर चीन के रडार पर होगा और चीन अपनी अभिरुचि के अनुरूप कोई भी गुणा भाग कर सकता है। ऐसा होना भारत के लिए इतना खतरनाक हो जाएगा कि भारत की अखंडता खतरे में पड़ जाएगी।
केवल तिब्बत पर भावनात्मक निर्णय के कारण भारत की सामरिक स्थिति कमजोर बन गई। हिमालय के तटवर्ती देशों में हम हाशिये पर पहुंच गए। भारत की छवि का भी गंभीर मसला है। शायद 1962 से भी ज्यादा। महाशक्ति पड़ोसी देश के रूप में जब यह कहते हुए गुजरेगा कि भारत की औकात क्या है? मेरे बूते पर जिंदा है तो भारत के लिए भू-राजनीतिक रूप से दक्षिण एशिया में ही स्वाभिमान से रहना मुश्किल हो जाएगा। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका भी दूर खिसक जाएंगे।
ऐसे में प्रधानमंत्री की यात्रा जरूरी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेषता रही है कि उनका हर कदम एक नई कूटनीति की व्याख्या करता है। साल 2014 में तिब्बत के प्रधानमंत्री को अपने शपथग्रहण के दौरान निमंत्रण दिया था, जिससे चीन की बेचैनी बढ़ गई थी। आज फिर भारत, उसी चीन से दो-दो हाथ के लिए तैयार है।
हांगकांग और ताइवान पर भारत ने चीन को कुरेदेने का काम शुरू कर दिया है। स्थिति बिगड़ी तो 'वन चीन' की संज्ञा में भी बदलाव आ सकता है। भारत किसी बाहरी देश के बूते पर युद्ध की गर्जना नहीं करता। लेकिन आज अमेरिका सहित पश्चिमी दुनिया भारत के साथ है। चीन की विस्तारवादी और 'वोल्फ डिप्लोमेसी' खतरे में है। अगर परिस्थिति का लाभ भारत को मिलता है तो उसे जमकर उठाना चाहिए क्योंकि चीन की नीयत और दोस्ती का अंदाजा सबको हो चुका है।
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