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पाकिस्तान में नई मुश्किल फंसे इमरान, सड़कों पर उतरा जनसैलाब

Sat, 02 Nov 2019 02:50 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 02 Nov 2019 02:50 PM IST
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azadi march against PM Imran Khan in pakistan
आजादी मार्च प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के लिए यह ख़तरे की घंटी है। - फोटो : Facebook

बरसों बाद पाकिस्तान की अवाम इस तरह चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर आई है। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के लिए यह ख़तरे की घंटी है। उनके लिए एक सबक़ भी है। आज का पकिस्तान अब केवल गाल बजाने से सम्मोहित नहीं होता। एक साल का वक़्त काफी होता है। दो चार क़दम तो ऐसे उठाए ही जा सकते थे ,जो बदहाली का शिक़ार लोगों पर राहत के छींटों की तरह गिरते। लेकिन मिस्टर यू टर्न प्राइम मिनिस्टर के पास कोई रोडमैप ही नहीं था। जो फ़ौज की बैसाखियों के सहारे सत्ता में आया हो, उसे यह तो ध्यान में रखना ही चाहिए था कि अगर किसी दिन सेना ने ये बैसाखियां हटा लीं तो वह किसके सहारे खड़ा रहेगा?

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दरअसल, उन्हें अपनी छबि सिर्फ़ काम के आधार पर बनानी थी, तभी वे अवाम के दिलों में जगह बना सकते थे। सेना ने उन्हें भरपूर अवसर भी दिया।अफ़सोस ! इमरान ख़ान ने यह समय कश्मीर पर आंसू बहाने और हिन्दुस्तान को कोसने में ज़ाया कर दिया। अब मुल्क़ के सब्र का घड़ा भर चुका है। प्रधानमंत्री के हाथ की स्लेट पर एक विराट शून्य के अलावा कुछ नहीं है। उन पर अब फौजी जनरल बाजवा की तलवार लटक रही है। 
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यह अप्रत्याशित ही है कि पाकिस्तान के कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे हैं। अब वे प्रधानमन्त्री का इस्तीफ़ा चाहते हैं। वहां के उदारवादी और बुद्धिजीवी तो हमेशा फ़ौज का विरोध करते रहे हैं। वे कश्मीर पर अपने हुक्मरानों से सहमत नहीं हैं।
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ये लोग भारत से दोस्ती के हक़ में हैं। इनका कहना है कि यह पत्थर पर लिखी इबारत है कि भारत से लड़कर पाकिस्तान अपने को बरबाद ही करेगा। कश्मीर उसे नहीं मिलेगा। कश्मीर में आतंक फैलाने के लिए वह जो बजट ख़र्च करता है ,उससे अपने देश के ग़रीबों को दो जून की रोटी तो मुहैया करा सकता है। लेकिन इस पड़ोसी देश में फ़ौज और कटटरपंथियों ने एक तरह से जम्हूरियत की आत्मा का अपहरण कर लिया है।

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इमरान खान अपने वादों को पूरा नहीं कर पाए। - फोटो : ANI

प्रधानमंत्री भले ही निर्वाचित होते रहे हों ,वे इन दोनों के सख़्त शिकंजे में जकड़े रहते हैं। ऐसे में कट्टरपंथी खुली बग़ावत कर बैठे हैं तो इसके दो अर्थ निकलते हैं। एक-या तो वे वाकई इमरान ख़ान की हुक़ूमत से त्रस्त हो चुके हैं और स्वप्रेरणा से सड़कों पर आए हैं और दूसरा यह कि सेना भी इमरान ख़ान से छुटकारा पाना चाहती है। लेकिन वह इसे औपचारिक तख़्तापलट की शक़्ल नहीं देना चाहती।

जनरल बाजवा जानते हैं कि विश्व राजनीति में अलग-थलग पड़े पाकिस्तान में यदि उन्होंने एक बार फिर फौजी सत्ता क़ायम की तो आने वाले अनेक साल तक विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर भरोसा करना छोड़ देगी, इसलिए परदे के पीछे से सेना इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ जन आंदोलन को समर्थन दे रही है। गंभीर स्थिति निर्मित होने पर वह इमरान की बैसाखी खिसका लेगी और गरीब मुल्क़ फिर एक बार चुनाव के द्वार खड़ा हो जाएगा।

पाकिस्तान का भविष्य क्या है? या तो नवाज़ शरीफ और बिलावल भुट्टो की पार्टियां अन्य लोगों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा करे अथवा देश में नए चुनाव कराए जाएं। फ़ौज के तरकश में अब भी एक तीर है जिसका अभी तक इस्तेमाल नहीं हुआ है।

अतीत में नवाज़ शरीफ़ ने तो फौज से पंगा लिया था और दूरी इतनी बढ़ गई थी कि उसे पाटने की कोई संभावना नहीं थी, इसीलिए जनरल बाजवा ने उन्हें सफ़ाई से अलग कर दिया। अब उनके भाई शाहबाज़ शरीफ़ पर वह दांव लगा सकती है।

शाहबाज़ के सेना के साथ दशकों से मधुर संबंध रहे हैं। नवाजशरीफ के प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अनेक बार परदे के पीछे से फ़ौज और प्रधानमंत्री के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। बिलावल जरदारी उसकी पहली पसंद कभी नहीं बनेंगे। बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद से यह परिवार भी फौज को पसंद नहीं करता। उसे संदेह है कि बेनज़ीर की हत्या के पीछे सेना का हाथ था।

इसका एक कारण यह भी समझा जाता है कि बेनज़ीर और भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच कश्मीर को लेकर सहमति बन गई थी और पाक में लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने पर काफी काम हो रहा था। अगर ऐसा हो जाता तो सेना एक एपेंडिक्स की तरह रह जाती। नवाज़शरीफ़ को हटाने के पीछे भी यही कारण है। एक बार पाकिस्तान अपनी नियति के चौराहे पर खड़ा है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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