घर, कार से लेकर हर छोटी-बड़ी वस्तु को खरीदने के लिए लोग लोन लेने लगे हैं। लेकिन आपको मालूम होना चाहिए कि लोन लेना एक दोधारी तलवार की तरह है। लोन या फिर ईएमआई पर सामान लेने से आप पहले खरीद कर बाद में चुकाने का ऑप्शन तो मिलता ही है, लेकिन इसके साथ ही शार्ट के साथ-साथ लांग टर्म में आपकी वित्तीय हालत को खराब भी कर सकता है।
लोन लेने से पहले रखें इन 5 बातों का ख्याल, होगा बड़ा फायदा
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ब्याज दर का करें चुनाव
लोन से पहले सभी तरह का ऑफर का बखूबी अध्ययन करें। इसमें यह देंखे कि कंपनी या फिर बैंक आपको लोन पर ब्याज दर कैसे देगा। अमूमन दो तरह से बैंक और कंपनियां ग्राहकों को लोन पर ब्याज देती हैं। यह ब्याज फिक्सड या फिर फ्लोटिंग के तौर पर मिलता है। आपके लिए फिक्स्ड रेट होम लोन और फ्लोटिंग रेट होम लोन के बीच अंतर जानना काफी जरूरी होता है। अगर आप फिक्स्ड रेट होम लोन लेते हैं तो पूरे लोन के काल के लिए आपकी ईएमआई बदलती नहीं है।
फिक्स्ड रेट होम लोन लेना तब लाभकारी होता है जब आगे चलकर ब्याज दरों के बढ़ने का संभावना हो। फ्लोटिंग रेट में बेस रेट के साथ फ्लोटिंग रेट के आधार पर आपके होम लोन की ब्याज दर तय की जाती है। इससे बेस रेट के उतार चढ़ाव का असर ईएमआई पर पड़ता है। फ्लोटिंग रेट होम लोन लेना तब लाभकारी होता है जब निकट भविष्य में ब्याज दरें नीचे आने की उम्मीद हो।
नेट इनकम के अलावा यह भी होना जरूरी
किसी को भी लोन उसकी आमदनी और कर्ज चुकाने की क्षमता के आधार पर मिलता है। होम लोन देने वाले बैंक और लोन की राशि के रुप में ज्यादातर प्रॉपर्टी की 80 फीसदी वैल्यू के बराबर लोन देते हैं। आमदनी को जांचते समय वो आपकी नेट इनकम को नहीं देखते जो पे स्लिप पर लिखी हो बल्कि वो आमदनी देखते हैं जो लोन चुकाने के लिए उपयोग की जाएगी।
सिबिल स्कोर होगा कम तो नहीं मिलेगा लोन
लोन किसी इंसान की क्रेडिट काबिलियत के आधार पर मिलता है। क्रेडिट इनफॉर्मेशन ब्यूरो इंडिया लिमिटेड (सिबिल) आपको 300 से 900 अंकों के बीच एक स्कोर प्रदान करता है। ये इस आधार पर तय होता है कि आपका पहले का क्रेडिट कार्ड उपयोग कितना है, आप अपना बैंक अकाउंट कैसे रखते हैं, कोई चेक तो बाउंस नहीं हुआ है, मौजूदा लौन, बिना इंश्योरेंस के मौजूदा लोन, लोन के रीपेमेंट और आपने कितनी बार लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन दिया है। जिन लोगों को सिबिल स्कोर 700 से ज्यादा होता है उन्हें लोन आसानी से मिल जाता है।
लोन की अवधि
लोन की राशि, ब्याज दर और इसकी कुल अवधि के आधार पर ईएमआई तय होती है। ईएमआई लोन अवधि के विपरीत संबंध में होती है। जैसे जितनी ज्यादा लोन की अवधि होगी उतनी ही कम ईएमआई होगी और जितनी कम लोन अवधि होगी, उतनी महंगी ईएमआई होगी। इसी तरह कुल ब्याज दर भी लोन की अवधि के आधार पर तय किया जाता है। जितनी ज्यादा लोन अवधि होगी उतनी ही ऊंची ब्याज दर होगी और जितनी कम लोन अवधि होगी उतनी ही कम ब्याज दर होगी।