फिल्म बार्डर में अभिनेता सनी देओल का किरदार तो याद ही होगा। 1971 में लोंगेवाला की लड़ाई के हीरो महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने शनिवार सुबह नौ बजे माेहाली के फोर्टिस हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। 78 साल के ब्रिगेडियर चांदपुरी ब्लड कैंसर से पीड़ित थे। उनकेे जीवन पर मशहूर बॉलीवुड फिल्म बॉर्डर बनी थी। 1971 में जब भारत और पाक के बीच यह जंग लड़ी गई थी उस समय शायद आप उसके गवाह नहीं बने थे लेकिन फिल्म बॉर्डर के जरिए आपको इस जंग की एक झलक देखने को मिली होगी। इस फिल्म में सनी देओल का रोल आज भी हर किसी के जेहन में ताजा है। यह तो फिल्म की बात है हम आपको आज बता रहे हैं रीयल लाइफ के सुपर हीरो और 1971 की जंग में महावीर चक्र विजेता कुलदीप सिंह चांदपुरी के बारे में। जी हां, वही कुलदीप सिंह चांदपुरी, जिनका किरदार फिल्म बॉर्डर में सनी देओल ने निभाया था।
लौंगेवाला पोस्ट सुरक्षा की चुनौती कुछ सोच कर दी गई थी ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी को
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brigadier kuldeep singh
- फोटो : social media
1971 में हुए भारत-पाक युद्ध में (लोंगेवाला चेक पोस्ट पर) सेक्टर 33 चंडीगढ़ के रहने वाले ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने एक अहम भूमिका निभाई थी। लौंगेवाला की लड़ाई के बारे में जो लोग जानते हैं , वह आज भी ब्रिगेडियर चांदपुरी को इस लड़ाई का हीरो मानते हैं। लौंगेवाला पोस्ट शायद हमारी सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी और इस चुनौती को पूरा करने का जिम्मा दिया गया था मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को। वहीं ब्रिगेडियर चांदपुरी ने इस लड़ाई में मिली जीत का सारा श्रेय उन सैनिकों को दे दिया था जो उस समय लौंगेवाला में दुश्मनों का डटकर मुकाबला कर रहे थे।
120 बहादुरों के साथ लड़ी गई लौंगेवाला की लड़ाई
1971 की लड़ाई के समय मेजर चांदपुरी को पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन को लीड करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इससे पहले वह 1965 की लड़ाई में भी पाक सेना को धूल चंटा चुके थे। मेजर चांदपुरी के पास सिर्फ 120 लोगों का ट्रूप था तो सामने थे पाक की 51वीं इंफ्रेंटी ब्रिगेड के 2,000 से 3,000 सैनिक जिसके साथ 22वीं आर्म्ड रेजीमेंट की भी मदद मिल रही थी। पांच दिसंबर 1971 को एकदम तड़के दुश्मन ने भारतीय सेना पर हमला बोल दिया। हालात मुश्किल थे और फिर भी मेजर चांदपुरी को इन हालातों का सामना किया। पूरी रात उन्होंने 120 लोगों की कंपनी के साथ दुश्मनों का मुकाबला किया।
जल्दी हार न मानने वालों में से एक थे मेजर चांदपुरी
चांदपुरी अपने सैनिकों में रिइंफोर्समेंट आने तक जोश भरते रहे ताकि वह दुश्मन का मुकाबला कर सकें। एक बंकर से दूसरे बंकर तक जाकर वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते रहे। उस समय एयरफोर्स के पास जो एयरक्राफ्ट्स थे वह रात में लड़ाई नहीं कर सकते थे। सुबह तक मेजर चांदपुरी और उनकी कंपनी बहादुरों की तरह दुश्मन से लड़ती रही। सुबह जब एयरफोर्स पहुंची तो उसकी मदद सेना को मिली। लड़ाई के बाद मेजर चांदपुरी को महावीर चक्र से पुरस्कृत किया गया। इस पूरी स्टोरी को पढ़कर आपको बार्डर फिल्म की याद जरूर आ रही होगी।
2008 में विवाद से भी हुआ था सामना
वर्ष 2008 में इस लड़ाई के साथ एक नया विवाद सामने आ गया। मेजर जनरल आत्मा सिंह जिन्हें इस लड़ाई के लिए वीर चक्र मिला था वह, एयर मार्शल मोहिंदर सिंह बावा और आठ और लोगों ने दावा किया कि लौंगेवाला में सेना ने न तो कोई लड़ाई लड़ी और न ही चांदपुरी ने किसी तरह की कोई बहादुरी नहीं दिखाई। यह सिर्फ एयरफोर्स थी जिसने दुश्मनों का सामना किया और पाक को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस बात पर ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने एयरफोर्स के आफिसर्स को आधिकारिक तौर पर चैंलेंज किया। ब्रिगेडियर चांदपुरी ने कहा कि उन्हें इस लड़ाई की वजह से लोकप्रियता हासिल हुई, उससे परेशान होकर इन अधिकारियों ने यह कदम उठाया है।