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हजारों साल तक खुद को रख सकते हो जिंदा, ये है तरीका
बीबीसी हिंदी
Updated Thu, 11 Jan 2018 09:43 AM IST
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हर इंसान की ख़्वाहिश होती है कि उसके मरने के बाद भी लोग सदियों तक उसे याद रखें। ये हसरत पूरी करने के लिए लोग सौ-सौ जतन करते हैं।
थॉमस सेयर्स
बेहद मशहूर था थॉमस सेयर्स
मिसाल के लिए ब्रिटेन का थॉमस सेयर्स अपने ज़माने का मशहूर मुक्केबाज़ था। वो पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन बॉक्सिंग में उसका कोई सानी नहीं था। उसका फ़ाइनल मैच हैम्पशायर में हुआ था। इसे देखने के लिए हज़ारों लोगों का मजमा लगा। मैच के लिए प्रशासन की ओर से स्पेशल ट्रेन चलाई गई। मैच देखने वालों में उस वक़्त ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे लॉर्ड पामरस्टन, लेखक विलयम थैकरे और चार्ल्स डिकेंस जैसे बड़े उपन्यासकार तक शामिल थे।
यहां तक कि उस दिन ब्रिटिश संसद की कार्रवाई भी कुछ घंटों के लिए ही चली। आदेश दिए गए थे कि महारानी विक्टोरिया को इस मैच की पूरी जानकारी दी जाए। 1865 में जब मुक्केबाज़ थॉमस सेयर्स की मौत हुई तो लाखों लोग उसके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। थॉमस सेयर्स को गुज़रे डेढ़ सौ बरस से ज़्यादा बीत चुके हैं। आज मुक्केबाज़ी के शौक़ीनों को छोड़कर शायद ही कोई थॉमस सेयर्स का नाम जानता है।
मिसाल के लिए ब्रिटेन का थॉमस सेयर्स अपने ज़माने का मशहूर मुक्केबाज़ था। वो पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन बॉक्सिंग में उसका कोई सानी नहीं था। उसका फ़ाइनल मैच हैम्पशायर में हुआ था। इसे देखने के लिए हज़ारों लोगों का मजमा लगा। मैच के लिए प्रशासन की ओर से स्पेशल ट्रेन चलाई गई। मैच देखने वालों में उस वक़्त ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे लॉर्ड पामरस्टन, लेखक विलयम थैकरे और चार्ल्स डिकेंस जैसे बड़े उपन्यासकार तक शामिल थे।
यहां तक कि उस दिन ब्रिटिश संसद की कार्रवाई भी कुछ घंटों के लिए ही चली। आदेश दिए गए थे कि महारानी विक्टोरिया को इस मैच की पूरी जानकारी दी जाए। 1865 में जब मुक्केबाज़ थॉमस सेयर्स की मौत हुई तो लाखों लोग उसके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। थॉमस सेयर्स को गुज़रे डेढ़ सौ बरस से ज़्यादा बीत चुके हैं। आज मुक्केबाज़ी के शौक़ीनों को छोड़कर शायद ही कोई थॉमस सेयर्स का नाम जानता है।
थॉमस सेयर्स
कामयाबी के क़िस्से
अब सवाल उठता है कि शोहरत की बुलंदी हासिल करने वाले खिलाड़ी को लोगों ने इतनी आसानी से कैसे भुला दिया। क्या वजह है कि कुछ लोग लंबे समय तक यादों में ज़िंदा रहते हैं। उनकी कामयाबी के क़िस्से बच्चों को सुनाए जाते हैं। उनकी ज़िंदगी पर फ़िल्में बनाई जाती हैं, किताबें लिखी जाती हैं, जबकि कुछ लोग चंद दिनों में भुला दिए जाते हैं।
चलिए आज आपको बताते हैं कुछ ऐसे नुस्ख़े, जिन पर अमल करके आप ख़ुद को अमर कर सकते हैं....
अब सवाल उठता है कि शोहरत की बुलंदी हासिल करने वाले खिलाड़ी को लोगों ने इतनी आसानी से कैसे भुला दिया। क्या वजह है कि कुछ लोग लंबे समय तक यादों में ज़िंदा रहते हैं। उनकी कामयाबी के क़िस्से बच्चों को सुनाए जाते हैं। उनकी ज़िंदगी पर फ़िल्में बनाई जाती हैं, किताबें लिखी जाती हैं, जबकि कुछ लोग चंद दिनों में भुला दिए जाते हैं।
चलिए आज आपको बताते हैं कुछ ऐसे नुस्ख़े, जिन पर अमल करके आप ख़ुद को अमर कर सकते हैं....
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जूलियस सीज़र
खुद की मार्केटिंग का दौर
आज मार्केटिंग का दौर है। जब तक आप अपने काम का बखान ख़ुद नहीं करेंगे, कोई आपको जानेगा नहीं। गुज़रे ज़माने में भी इस तरह की तरकीबें आज़माई जाती रही हैं। मिसाल के लिए सिकंदर-ए-आज़म को ही ले लीजिए। उसने दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य बनाया। अब भला वो क्यों नहीं चाहेगा कि दुनिया उसे याद रखे। लिहाज़ा उसने अपने पूरे साम्राज्य में अपनी तस्वीर वाले एक जैसे सिक्के चलवाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी पता रहे कि वहां कभी सिकंदर का राज था।
इसी तरह सदियां बीत जाने के बावजूद लोगों को रोमन बादशाह जूलियस सीज़र याद है। इसकी बड़ी वजह है कि सीज़र ने ख़ुद का ख़ूब प्रचार किया था। अपने युद्धों के दौरान सीज़र इतिहासकारों की टोली अपने साथ रखता था। इन का काम ही था सीज़र के मिशन की एक-एक तफ़सील दर्ज करना। सीज़र का मक़सद था आने वाली पीढ़ियों तक पैग़ाम पहुंचाना।
आज मार्केटिंग का दौर है। जब तक आप अपने काम का बखान ख़ुद नहीं करेंगे, कोई आपको जानेगा नहीं। गुज़रे ज़माने में भी इस तरह की तरकीबें आज़माई जाती रही हैं। मिसाल के लिए सिकंदर-ए-आज़म को ही ले लीजिए। उसने दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य बनाया। अब भला वो क्यों नहीं चाहेगा कि दुनिया उसे याद रखे। लिहाज़ा उसने अपने पूरे साम्राज्य में अपनी तस्वीर वाले एक जैसे सिक्के चलवाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी पता रहे कि वहां कभी सिकंदर का राज था।
इसी तरह सदियां बीत जाने के बावजूद लोगों को रोमन बादशाह जूलियस सीज़र याद है। इसकी बड़ी वजह है कि सीज़र ने ख़ुद का ख़ूब प्रचार किया था। अपने युद्धों के दौरान सीज़र इतिहासकारों की टोली अपने साथ रखता था। इन का काम ही था सीज़र के मिशन की एक-एक तफ़सील दर्ज करना। सीज़र का मक़सद था आने वाली पीढ़ियों तक पैग़ाम पहुंचाना।
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सिकंदर-ए-आज़म
पहचान बनाने में पेशा मददगार
हालांकि आज के दौर में भी लोग इसी तरह की चीज़ों पर अमल करते हैं। अब चूंकि तकनीक का ज़माना है, लिहाज़ा खुद की मार्केटिंग के तरीक़े भी थोड़े से बदलने पड़ेंगे। पहचान बनाने में पेशा बहुत मददगार होता है, इसलिए पेशे का इंतख़ाब बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। प्राचीन काल में दार्शनिकों की आम जनता के बीच कोई ख़ास पहचान नहीं थी, लेकिन आज सदियां बीत जाने के बाद लोग उन्हें याद करते हैं। उनका दर्शनशास्त्र बच्चों को पढ़ाया जाता है, क्योंकि उनके विचारों ने ज़िंदगी को एक अलग अंदाज़ में देखने का मौक़ा दिया।
हालांकि आज के दौर में भी लोग इसी तरह की चीज़ों पर अमल करते हैं। अब चूंकि तकनीक का ज़माना है, लिहाज़ा खुद की मार्केटिंग के तरीक़े भी थोड़े से बदलने पड़ेंगे। पहचान बनाने में पेशा बहुत मददगार होता है, इसलिए पेशे का इंतख़ाब बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। प्राचीन काल में दार्शनिकों की आम जनता के बीच कोई ख़ास पहचान नहीं थी, लेकिन आज सदियां बीत जाने के बाद लोग उन्हें याद करते हैं। उनका दर्शनशास्त्र बच्चों को पढ़ाया जाता है, क्योंकि उनके विचारों ने ज़िंदगी को एक अलग अंदाज़ में देखने का मौक़ा दिया।