इंसान सदियों से करेंसी यानी मुद्रा का इस्तेमाल खरीद-फरोख्त और कारोबार के लिए करता आया है। एक दौर था जब महंगे रत्नों में कारोबार हुआ करता था। लोग मोती, कौड़ियां और दूसरे रत्न देकर चीजें खरीदा करते थे। फिर सिक्कों का चलन शुरू हुआ। सोने-चांदी, तांबे, कांसे और अल्यूमिनियम के सिक्के तमाम साम्राज्यों और सभ्यताओं में ढाले गए।
दुनिया का वो द्वीप, जहां पत्थर से बने सिक्कों का होता था इस्तेमाल
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जब एक भिश्ती बना हिंदुस्तान का सुल्तान
जब मुगल बादशाह हुमायूं की जान भिश्ती (एक पानी पिलाने वाले ने) बचाई, तो हुमायूं ने उसे एक दिन का बादशाह बना दिया। तब भिश्ती ने हिंदुस्तान में चमड़े के सिक्के चलवा दिए थे। सिक्कों के साथ ही नोटों का चलन भी शुरू हुआ। सबसे पहले चीन में करेंसी नोट छापे गए थे। लेकिन, औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप की औपनिवेशिक ताकतों ने करेंसी नोटों के चलन को खूब बढ़ावा दिया। पर, क्या कभी आप ने करेंसी के रूप में बड़े-बड़े पत्थरों के इस्तेमाल की बात सुनी है?
नहीं न! तो, चलिए आज आप को ऐसी जगह की सैर पर ले चलते हैं, जहां की करेंसी पत्थर है। और सदियों से ऐसा होता आ रहा है। इसके लिए आप को प्रशांत महासागर के माइक्रोनेशिया इलाके में जाना पड़ेगा। यहां पर बहुत छोटे-छोटे जजीरे आबाद हैं। इन्हीं में से एक द्वीप है याप। ये छोटी सी जगह है, जहां कुल मिलाकर 11 हजार लोग रहते हैं। मगर इसकी शोहरत ऐसी है कि 11वीं सदी में मिस्र के एक राजा के हवाले से याप का जिक्र मिलता है। इसी तरह मशहूर यूरोपीय यात्री मार्को पोलो ने तेरहवीं सदी में लिखी अपनी एक किताब में इसका जिक्र किया है। इन दोनों ही मिसालों में कहीं भी याप का नाम नही लिखा है। मगर दोनों साहित्यों में एक ऐसी जगह का जिक्र है, जहां की करेंसी पत्थर हुआ करती थी।
जब आप याप पहुंचेंगे, तो आपका सामना घने जंगलों, दलदले बागों और बेहद पुराने दौर के हालात से होगा। दिन भर में सिर्फ एक फ्लाइट है, जो याप के छोटे से हवाई अड्डे पर उतरती है। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही आप को कतार से लगे छोटे-बड़े ढले हुए पत्थर दिखेंगे। इनके बीच मे छेद होता है, ताकि इन्हें कहीं लाने- ले जाने में सहूलत हो। पूरे याप द्वीप पर ऐसे छोटे-बड़े पत्थर जहां-तहां पड़े दिख जाते हैं। याप द्वीप की मिट्टी दलदली है। यहां चट्टानें नहीं हैं। फिर भी पत्थर की इस करेंसी का चलन यहां सदियों से है। किसी को नहीं पता कि इसकी शुरुआत कब हुई थी।
लेकिन, स्थानीय लोग बताते हैं कि आज से सैकड़ों साल पहले याप के बाशिंदे डोंगियों में बैठकर चार सौ किलोमीटर दूर स्थित पलाऊ द्वीप जाया करते थे। वहां से वो चट्टानें काटकर ये पत्थर तराशा करते थे। फिर इन्हें नावों में लाद कर यहां याप लाया जाता था। इन्हें राई कहा जाता है। पिछली कई सदियों से इन पत्थरों को करेंसी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। पहले याप के आदिवासी इन पत्थरों को बड़े बेढंगे तरीके से काटकर यहां लाते थे।