बेहतर स्वास्थ्य के लिए अपने ही मल को खरगोशों के द्वारा खाना एक बेहद जरूरी प्रक्रिया है। बता दें कि खरगोश एक ऐसा जीव है, जिसका पाचन तंत्र अच्छे से विकसित नहीं होता है। यह जीव अपना अधिकांश जीवन घास खाकर ही बिताता है, जिसके कारण खरगोश के शरीर से बहुत से जरूरी न्यूट्रिएंट्स बिना पचे ही बाहर निकल जाते हैं। ऐसे में खरगोश उसे फिर से खाकर अधिक से अधिक पोषक तत्व पचाते हैं।
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खरगोश (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : सोशल मीडिया
खरगोशों की ये स्थिति बिल्कुल वैसे ही है, जैसे गाय और भैंस जैसे अधिकांश चौपाया जानवर अपने भोजन को वापस मुंह में लाकर उसे पचाते हैं। खरगोशों के मल दो किस्म की होती है, पहला तरल और दूसरा सख्त। तरल मल को सीकोट्रोप कहा जाता है, जो पोषक तत्वों से भरपूर होती है। खरगोश इसे खाकर पोषक तत्वों को पचाते हैं और इसके बाद सख्त मल का त्याग करते हैं।
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खरगोश (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : Pixabay
सीकोट्रोप यानी खरगोश के तरल मल में सख्त मल की तुलना में दोगुने पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें विटामिन के और विटामिन बी 12 होता है। अगर खरगोश सीकोट्रोप को नहीं खाएंगे, तो उनके शरीर से अधिकांश पोषक तत्व बिना पचे ही निकल जाएंगे।
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खरगोश (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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दरअसल, खरगोश शाकाहारी जानवर होत हैं, जो सिर्फ सब्जियां या घास खाते हैं। ऐसे में उनके शरीर के लिए फाइबर बहुत जरूरी होता है। खरगोश एक ऐसा जीव है, जिसका पाचन तंत्र रात में बहुत तेजी से काम करते हुए बहुत से भोजन को बिना पचाए ही बाहर निकाल देता है। इस वजह से सीकोट्रोप यानी तरल मल का त्याग रात में ही करते हैं और उसी समय इसे खा भी लेते हैं। तरल मल को वो पूरी तरह से पचाकर सख्त मल की तरह बाहर निकालते हैं।
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खरगोश (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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जानवरों की दुनिया में खरगोश ही केवल ऐसा जीव नहीं है, जो अपना मल खाता है। छोटे चूहों और गिनी पिग समते खई शाकाहारी जानवरों में ऐसी प्रवृत्ति पाई जाती है। वैसे धरती पर ऐसे भी कई जीव हैं, जो दूसरों का मल भी खाते हैं। ऐसे जानवर पर्यावरण के लिए बहुत फायदेमंद हैं।