दुनियाभर में आज भी ऐसी कई परंपराएं हैं जिसके बारे में जानकर आश्चर्य होता है। इन्हीं में से एक है ‘मिज्जू’ परंपरा। आज के दौर में जहां लोग बचपन की दोस्ती तक की लाज नहीं रखते, वहीं, उत्तराखंड के कुमाऊं में दोस्ती सात पीढ़ियों तक निभाई जाती है।
‘मिज्जू’ परंपरा की शुरुआत चंद वंश के राजाओं ने की थी। इसके तहत दो अलग-अलग जाति के लोग भी एक दूसरे की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं। एक बार दोस्ती पक्की हो गई तो पूरा खानदान उसे स्वीकार कर लेता है और पीढ़ी दर पीढ़ी वह रिश्ता कायम रखा जाता है।
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- फोटो : Getty Images
इस परंपरा की दिलचस्प बात यह है कि एक कमजोर ब्राह्मण की दोस्ती बाहुबली ठाकुर से और दलित की दोस्ती सवर्ण से मुमकिन हो जाती है। साहित्यकार प्रकाश जोशी शूल का कहना है कि यह परंपरा जाति कुल के बंधन से दूर होती है। दो अजनबी परिवारों के बीच ‘मिज्जू’ लगाने की परंपरा से तत्कालीन सामाजिक सुरक्षा का बोध भी होता है।
जिन दो परिवारों के बीच ‘मिज्जू’होता है, वे एक दूसरे को रोली टीका लगाते हैं। इससे पहले पूजा अर्चना भी कराई जाती है। कुछ दिन बाद बकरी-भात का आयोजन भी होता है और दोनों परिवार एक दूसरे को उपहार देते हैं।
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पुुरुषों के बीच होने वाली ऐसी दोस्ती को ‘मिज्जू’ कहते हैं। वहीं, कुमाऊं क्षेत्र की मगिलाओं के बीच ऐसे संबंध को ‘संगज्यू’ लगाना कहा जाता है। प्रेमा देवी के अनुसार आम तौर पर विवाह से पूर्व दो अलग-अलग जातियों की बालिकाओं के बीच ‘संगज्यू’ लगाई जाती है। विवाह के बाद ‘संगज्यू’ के दो परिवार के बीच भी मित्रता का संबंध कायम हो जाता है।