{"_id":"578dbc7b4f1c1b9d32c4c925","slug":"guru-poornima-why-teacher-caller-god","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"गुरु पूर्णिमा विशेषः इसलिए गुरु को ब्रह्मा, विष्णु महेश कहा गया है","category":{"title":"Spirituality","title_hn":"आस्था","slug":"spirituality"}}
गुरु पूर्णिमा विशेषः इसलिए गुरु को ब्रह्मा, विष्णु महेश कहा गया है
Tue, 19 Jul 2016 11:17 AM IST
गायत्री तीर्थ/शांतिकुंज, हरिद्वार
गायत्री तीर्थ/शांतिकुंज, हरिद्वार
Updated Tue, 19 Jul 2016 11:17 AM IST
विज्ञापन
1 of 1
विष्णु शिव
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
शिव पुराण में बताया गया है कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को भगवान विष्णु के अंशावतार वेदव्यास जी का जन्म हुआ है। इसलिए जगद्गुरु की उपाधि से सुशोभित वेदव्यास सहित अन्य गुरुओं की पूजा के महापर्व के रूप में आषाढ़ पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। मानवता को अज्ञानता से मुक्त कराने के लिए परमेश्वर ने गुरु रूप में अपने हृदय से ज्ञान का अंश निकाला जिसके ज्ञान से शिष्य में अज्ञान रूपी अन्धकार दूर होता है और वह तमसो मा ज्योतिर्गमय की ओर अग्रसर होता है।
वास्तव में गुरु कृपा के बिना सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं होता। जीवन रहस्यों का उद्घाटन केवल गुरु ही करने में सक्षम होते हैं। जिस प्रकार नेत्रहीन व्यक्ति को संसार का अनुपम सौन्दर्य दिखाई नहीं दे सकता, उसी प्रकार जब तक गुरु हमें प्रकाश नहीं देगा, उनका मार्गदर्शन हमें नहीं मिलेगा, तब तक आँखें रहते हुए भी हमें चारों ओर अंधकार ही अंधकार नजर आएगा। हम सही रास्ते पर नहीं चल सकेंगे। सद्गुरु के बिना अच्छे कार्य सफल नहीं हो सकते।
बच्चा जन्म लेने के पश्चात् सर्वप्रथम माता के संपर्क में आता है। उसके बाद बालक धीरे-धीरे बड़ा होकर स्कूल जाने लगता है। विद्या प्राप्ति के लिए उसे गुरु के पास भेजा जाता है। गुरु को माता-पिता तथा ईश्वर से भी बढ़कर बताया गया है। माता-पिता तो बच्चे को जन्म देकर उसका पालन-पोषण ही करते हैं, जबकि उसके विकास में सहायता करने वाला, उसे सन्मार्ग पर चलाने वाला गुरु ही होता है। वही मनुष्य का कल्याण कर उसके लिए मुक्ति का द्वार खोलता है। भगवान् मनु ने तो विद्या को माता तथा गुरु को पिता बताया है।
हमारे देश के तत्त्वदर्शी ऋषियों ने अपने अनुभवों तथा खोजबीन के आधार पर यही निष्कर्ष निकाला है कि व्यक्ति केवल आर्थिक रूप से सुखी नहीं रह सकता। उसके जीवन में श्रेष्ठ गुणों का समावेश होना आवश्यक है। उसे इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए, जिससे वह इस बात को भलीभाँति जान सके कि उसका इस धरती पर अवतरित होने का उद्देश्य क्या है? उसे क्या करना है? जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, उसी प्रकार दूसरों के अन्दर के अज्ञान को दूर कर उसे ज्ञान का प्रकाश देना, उसके सुख-दुख में भागीदारी, ‘जियो तथा जीने दो’की भावना मनुष्य के अंदर होनी चाहिए।
गुरु अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। वह सोये हुए को जगाता है, भटके हुए को राह दिखाता है। स्वार्थ में लगे हुए को परमार्थ के लिए प्रेरित करता है, विपत्ति में फँसे हुए का उद्धार करता है। निराशा के अंधकार में आशा की ज्योति जगाते हैं। इसलिए कहा गया है।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुरेव महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।