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ओलंपिक में एशियन गेम्स की कमी पूरी करेंगे बजरंग
अंशुल डांगी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 19 Oct 2014 02:00 PM IST
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पिता जी कुश्ती करते थे। उन्हें देखकर मुझे भी कुश्ती का शौक लगा। पिता जी अक्सर कहते थे कि बेटा जो मैं न कर सका, उसे तुम पूरा करना। उनका सपना है कि मैं ओलंपिक का मेडल जीतूं।
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एशियन गेम्स में तो स्वर्ण जीतने से चूक गया, लेकिन पिताजी के सपने को पूरा करना ही अब मेरा लक्ष्य है। यह कहना है एशियन गेम्स में कुश्ती के रजत पदक विजेता बजरंग का।
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करीब आठ साल की उम्र में गांव छोड़कर कुश्ती के अखाड़े में कूदने वाले बजरंग ने इंचियोन एशियन गेम्स में रजत पदक जीता था। इससे वह खुश तो हैं लेकिन स्वर्ण पदक नहीं जीतने का मलाल भी है।
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हरियाणा के झज्जर जिले के खुदान गांव निवासी 20 वर्षीय बजरंग ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि जब उन्होंने गांव छोड़ा था तो लोगों ने कहा था कि छोटा है कहां रहेगा, क्या करेगा करेगा। लेकिन मन में योगेश्वर दत्त की तरह बनने चाह थी, तो गांव से निकलकर दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम स्थित अखाड़े में आ गया।
गांव में पहलवान नरेंद्र पूनिया ने कुश्ती की बारीकियां बतायी थीं और हर मदद की थी। बाद में गुरु सतपाल से कुश्ती को जाना समझा।
कहा कि इंचियोन में फाइनल मुकाबले में जीत के करीब था, लेकिन आखिरी क्षणों में तकनीकि से हार गया। मेरा हाथ फिसला और दो अंक गवां बैठा। अब 2015 वर्ल्ड चैंपियनशिप और रियो ओलंपिक में यह गलती नहीं दोहराऊंगा।
दांव-पेंच में हमारे पहलवान काफी बेहतर
2005 में स्कूल गेम्स में कांस्य पदक जीतकर शुरुआत करने वाले बजरंग 7 बार स्कूल गेम्स के चैंपियन रहे। बजरंग ने बताया कि वे अभी तक जिस भी टूर्नामेंट में खेले खाली हाथ नहीं लौटे। बजरंग अभी तक करीब 27 अंतरराष्ट्रीय पदक जीत चुके हैं।
भारतीय कुश्ती टीम आज विश्व में टॉप-5 में शामिल है। हमारे पास बेहतरीन तकनीक है, जिसको दूसरे भी फॉलो करते हैं। मगर अन्य देशों के पास सुविधाएं हमसे अधिक हैं।
एशियन गेम्स में हम पिछड़ गए, लेकिन रियो ओलंपिक में यह शिकायत दूर हो जाएगी। कुश्ती में सबसे अधिक स्वर्ण हम ही जीतेंगे। यह कहना है ओलंपिक सिलवर मेडलिस्ट सुशील कुमार के गुरू और ससुर पद्मश्री सतपाल का।
हेरिटेज स्कूल के स्थापना दिवस समारोह में शिरकत करने देहरादून पहुंचे पद्मश्री सतपाल ने कहा कि 28 साल बाद एशियन गेम्स में भारत को गोल्ड मिला, लेकिन उम्मीद के अनुसार पहलवान प्रदर्शन नहीं कर सके।
इसमें कम से कम चार स्वर्ण पदकों की उम्मीद थी। अब ओलंपिक की तैयारियों के लिए देश के आठ पहलवानों को विशेष ट्रेनिंग के लिए बेलारूस और यूएसए भेजा जा रहा है। विश्व के टॉप-10 पहलवानों की वीडियो को देखकर उनकी स्टडी कराई जा रही है।
राष्ट्रपति गोल्ड मेडल से हैं सम्मानित
पद्मश्री सतपाल को 1976 में राष्ट्रपति गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था। 1974 में उनको अर्जुन अवार्ड, 1983 में पद्मश्री, 2009 में द्रोणाचार्य अवार्ड से नवाजा गया।
16 साल तक राष्ट्रीय चैंपियन रहे। 1972, 1976 और 1980 ओलंपिक में सतपाल ने देश का प्रतिनिधित्व किया। 1982 एशियाड में गोल्ड, 1978 में सिल्वर और 1974 कामनवेल्थ में कांस्य पदक जीते हैं।
उतराखंड में भी शानदार खिलाड़ी
देहरादून। पद्मश्री सतपाल ने कहा कि उत्तराखंड से खेल के क्षेत्र में शानदार खिलाड़ी निकल रहे हैं। उनके अखाड़े में भी 6-7 छोटे बच्चे उत्तराखंड के हैं। जो हरिद्वार जिले और आसपास के हैं, उनको भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है।
स्कूलों से तलाश रहे प्रतिभाएं
देहरादून। स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद्मश्री सतपाल ने कहा कि बीते दो साल से फेडरेशन ने स्कूली खेलों में कुश्ती को शामिल किया है। इससे अंडर-14, 17 और 19 वर्ग के खिलाड़ियों को तलाशा जा रहा है।