देश में द्रोणाचार्य अवॉर्ड और प्रदेश में अनदेखी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राष्ट्रपति के हाथों खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय मुकाम पर उपलब्धि दिलाने पर द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित वेटलिफ्टर कोच हंसा मनराल की उपलब्धि शायद उत्तराखंड सरकार को कम लगती है।
ऐसे ही 2001 में भारत सरकार ने नई दिल्ली में सुरेंद्र कनवासी को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था, लेकिन उत्तराखंड सरकार को इस उपलब्धि से कोई सरोकार नहीं है।
हंसा मनराल के मुद्दे पर खिलाड़ियों और कोचों में बहस छिड़ गई है। दिग्गज खिलाड़ी पुरस्कार के लिए साफ नियम बनाने की मांग कर रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर देश का मान बढ़ा रहे खिलाड़ियों के गुरुओं को केंद्रीय खेल मंत्रालय हर साल गुरु द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित करता है।
पिथौरागढ़ जिले के देवतोला गांव निवासी अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर कोच हंसा मनराल को भी 2000 में द्रोणाचार्य अवार्ड से मिला था।
लगातार दूसरे साल पुरस्कार से वंचित
उत्तराखंड में खेल अवॉर्ड की शुरुआत होने पर हंसा मनराल ने देवभूमि उत्तराखंड द्रोणाचार्य अवॉर्ड के लिए 2013 और 2014 में आवेदन किया। लेकिन खेल विभाग ने लगातार दूसरे साल उनको इस पुरस्कार से वंचित किया है।
मैंने उत्तराखंड को खिलाड़ी दिए हैं, जिस कारण मेरा चयन हुआ होगा। द्रोणाचार्य अवॉर्डी हंसा मनराल सर्वश्रेष्ठ कोच हैं, राष्ट्रीय स्तर पर वह मुझसे भी बेहतर कोच होंगी। लेकिन उन्होंने अभी तक सिर्फ नेशनल खिलाड़ियों को कोचिंग दी है, जिसमें उत्तराखंड का कोई नहीं है। इसलिए शायद उनका चयन नहीं हो सका होगा।
- नारायण सिंह राणा, निशानेबाजी कोच
हंसा शानदार कोच हैं। मगर उन्होंने उत्तराखंड के खिलाड़ियों को तैयार नहीं किया है। इसलिए उनको अवॉर्ड नहीं मिला है। खेल विभाग को स्पष्ट नियम बनाने की जरूरत है, ताकि विवाद न हो।
- पदम बहादुर मल्ल, अर्जुन अवॉर्डी बॉक्सर
द्रोणाचार्य अवॉर्ड के लिए कोच को उत्तराखंड का निवासी होना जरूरी है। कोच उत्तराखंड के खिलाड़ियों को कोचिंग दे रहा हैं या नहीं यह आवश्यक नहीं है।
- अजय अग्रवाल, उपनिदेशक खेल
वेटलिफ्टर गुरु एथलीट में भी चैंपियन
गोला, चक्का और भाला फेंक में राष्ट्रीय चैंपियन बनने के बाद अचानक पैर में चोट लगने से मैदान छोड़ने पर मजबूर हुई हंसा मनराल ने भारत्तोलन का रुख किया।
कोच गोविंद प्रसाद शर्मा से प्रोत्साहित होकर भारत्तोलन में 1986 और 1988 में सात राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए। 1991 में उत्तर प्रदेश में कोच के रूप में महिला वेटलिफ्टरों को संवारना शुरू किया।
हंसा मनराल की कोचिंग में ही पहली बार विश्व भारत्तोलन में देश को 5 रजत, 2 कांस्य मिले और 1999-2000 एशियाई चैंपियनशिप में 3 स्वर्ण, 4-रजत और 14 कांस्य देश ने जीते।
हंसा मनराल की कोचिंग में रोमा देवी, के मल्लेश्वरी, कुंजू रानी, एन लक्ष्मी, ज्योत्सना दत्ता, अनीता चानू, छाया, रेनू बाला, कल्याणी जैसी अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर तैयार हुए हैं।
अर्जुन अवॉर्डी कनवासी के साथ फिर छलावा
वर्ष 1990 में बीजिंग एशियन गेम्स में रोइंग/नौकायन में स्वर्ण पदक और वर्ष 2001 में अर्जुन पुरस्कार विजेता सुरेंद्र सिंह कनवासी को प्रदेश सरकार ने फिर निराश किया है।
बीते वर्ष स्वयं खेल मंत्री ने उन्हें वर्ष 2014 के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने का आश्वासन दिया था। लेकिन जब नाम घोषित हुए तो उसमें उनका नाम नहीं था।
जनपद चमोली के कोलसो गांव (कर्णप्रयाग) निवासी एसएस कनवासी वर्ष 1981 में सेना में भर्ती हुए। वर्ष 1983 में सीएमई पुणे में तैनाती के बाद वर्ष 1984 में उनका चयन सेना से रोइंग/नौकायन में कोलकाता में नेशनल गेम्स के लिए हुआ। इसी वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए उन्होंने देश के लिए रजत पदक जीता।
11 साल के खेल करियर में उन्होंने राज्य, राष्ट्रीय और विश्व स्तर पर पांच स्वर्ण, तीन रजत और तीन कांस्य पदक जीते। लेकिन पीठ दर्द के कारण कनवासी वर्ष 1992 के ओलपिंक का हिस्सा नहीं बन पाए, जिससे उन्होंने खेल से सन्यास ले लिया।