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चौपड़ा का मॉर्डन रूप है आज का लूडो

Sun, 12 Jul 2015 03:50 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 12 Jul 2015 03:50 PM IST
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traditional game ludo.

लूडो... गत्ते पर बना यह खेल अमूमन आज के समय हर कोई खेलता है। खासकर खाली बैठे रहने से बेहतर टाइम पास करने का लूडो सबसे अच्छा साधन है।

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कुछ-कुछ ऐसा ही खेल है चौपड़। प्राचीन काल से ही चौपड़ का खेल खेला जाता रहा है। महाभारत के समय कहें या फिर मुगल साम्राज्य में या फिर राजपूतों के रजवाड़ों में यह खेल आम था। उत्तराखंड में भी यह खेल प्राचीन समय से ही खेला जाता रहा है।
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चौपड़ खेल के न तो बड़ी जगह चाहिए और न ही बड़ा मैदान। न इंडोर स्टेडियम की जरूरत और न व्यवस्थित स्थान की। कहीं भी आसानी से कई लोग इस खेल को खेल सकते हैं। हरबर्टपुर के ओमप्रकाश उनियाल बताते हैं कि एक ही स्थान पर कई टीमों के बीच इस खेल की प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती थीं।
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चौपड़ों पर खाने बने होते थे, जिन पर गोटियों को आगे बढ़ाया जाता था। बताया कि यह खेल आज के लूडो जैसा ही था। फर्क इतना है कि लूडो गत्ते से निर्मित होता है, जबकि चौपड़ मखमली कपड़े की बनी होती थी। बीच में एक चौकोरनुमा जेब जिसमें गोटियां रखी जाती थीं।

यह गोटियां लगभग एक इंच ऊंची और गोल आकार की लकड़ी की बनी होती थीं। इनको लाल, हरे, पीले, नीले रंग से बनाया जाता था। खेलने के लिए छह कौड़ियां होती हैं। कौड़ियां हाथ की मुठ्ठी पर रखकर बारी-बारी से चौपड़ पर फेंकी जाती हैं।

सीधी तरफ गिरने वाली कौड़ी के अंक गिने जाते हैं और उसी के अनुरूप बारी-बारी से खेलने वाले की गोटियां आगे बढ़ाई जाती हैं। चौपड़ में चारों तरफ मखमली कपड़े से बनी चार पट्टियां होती हैं और इसको खेलने वाले कुल चार खिलाड़ी होते हैं। जो अलग-अलग भी खेल सकते हैं और दो-दो की टीम में भी। इसमें समय की कोई बंदिश नहीं होती।

हमें बताएं क्या हैं राज्य के पारंपरिक खेल
राष्ट्रीय खेल साल 2018 में उत्तराखंड में आयोजित किया जाना है। इसमें आयोजक प्रदेश का एक पारंपरिक खेल शामिल किया जाता है, लेकिन उत्तराखंड में अभी तक कोई पारंपरिक खेल सामने नहीं आया है।


हालांकि इसे खोजने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन खेल विभाग का कहना है कि अभी तक उनकी जानकारी में ऐसा कोई खेल नहीं आया है। अमर उजाला अपने पाठकों की मदद से राज्य के पारंपरिक खेल को सामने लाना चाहता है ताकि वह साल 2018 में होने वाले राष्ट्रीय खेलों में शामिल किया जा सके।

इस संबंध में आपके पास यदि किसी पारंपरिक खेल के बारे में जानकारी है तो उसके बारे में विस्तार से हमें लिखें। उसे अमर उजाला में प्रकाशित किया जाएगा।

पता यह है
आप editor@ddn.amarujala.com पर मेल कर सकते हैं अथवा अमर उजाला, शेड नंबर-2 औद्योगिक क्षेत्र पटेलनगर, देहरादून पर पत्र भी भेज सकते हैं। लिफाफे पर उत्तराखंड के पारंपरिक खेल जरूर लिखें।

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