फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   shooter vishal goyal dehradun

कलयुग का एकलव्यः बिना अंगुली लगाया निशाना

Mon, 28 Jul 2014 04:05 PM IST
अंशुल डांगी/ अमर उजाला, देहरादून
अंशुल डांगी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 28 Jul 2014 04:05 PM IST
विज्ञापन
shooter vishal goyal dehradun

किसी निशानेबाज के अचूक बनने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है, पिस्टल, तेज नजरें और सबसे बढ़कर वो अंगुली जो ट्रिगर दबाकर गोली को लक्ष्य पर भेदती है।

विज्ञापन


लेकिन, अगर किसी निशानेबाज की अंगुलियां ही छिन चुकी हों फिर भी उसकी पिस्टल से निकलने वाली हर गोली टारगेट के रास्ते से भटकती न हो तो? कुछ ऐसे ही निशानेबाज हैं विशाल गोयल।
विज्ञापन


बम विस्फोट में कोहनी से नीचे दोनों हाथ गवां चुके विशाल ने अंगुलियों नहीं, अपने जज्बे के बूते खुद को अचूक निशानेबाज साबित किया है।

‘गेंद’ में हुआ था धमाका

shooter vishal goyal dehradun

दो बार की राज्य स्तरीय शूटिंग में गोल्ड जीतने वाले विशाल विकलांगों सहित सामान्य निशानेबाजों के लिए भी मिसाल बन गए हैं।

मूलत: बिजनौर (यूपी) के चांदपुर निवासी विशाल दून में रायपुर के ईश्वर विहार में रहते हैं। विशाल बताते हैं कि वर्ष 1990 में, जब वह छह वर्ष के थे एक दिन चांदपुर में घर के बाहर खेलते हुए उन्हें दो गेंद मिली।

विशाल ने गेंदें उठा ली और खेलने लगे। खेलते हुए अचानक गेंदों को जोर से जमीन पर पटका तो उनमें विस्फोट हो गया और विशाल के दोनों हाथ क्षतिग्रस्त हो गए।

आखिर विशाल के हाथ काटने पड़े। बाद में पता चला कि गेंदों के भीतर बम रखे गए थे।

ऐसे करते हैं शूटिंग

shooter vishal goyal dehradun

विशाल ने बताया कि वह पिस्टल को दोनों हाथों से पकड़ते हैं। कड़े अभ्यास के बाद उन्होंने हाथ के अगले छोर को ट्रिगर पर फंसाने का तरीका साध लिया है।

विशाल कहते हैं कि ऐसा करने में उन्हें लंबा वक्त लगा। लगातार कोशिश के बाद साफ हुआ कि बायें हाथ से वह आसानी से शूटिंग कर सकते हैं।

हालांकि, कई मौकों पर दायें हाथ से भी उन्होंने लक्ष्य पर गोली दागी है।

विज्ञापन

पापा ने दिया हौसला

shooter vishal goyal dehradun

विशाल बताते हैं कि उनके पिता सुरेश कुमार गोयल आढ़ती थे। पिता ने कभी उन्हें यह अहसास नहीं होने दिया कि हाथ न होने से उनकी जिंदगी मुश्किल हो गई है।

विशाल की चाहत शूटर बनने की थी तो पिता ने इसे पूरा करने की ठान ली। दस साल पूर्व परिवार चांदपुर से देहरादून शिफ्ट हो गया। इसके बाद जसपाल राणा शूटिंग इंस्टीट्यूट में विशाल को दाखिल करा दिया गया।

विशाल बताते हैं कि यहां जसपाल के पिता नारायण सिंह राणा ने प्रशिक्षण के साथ उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की सीख दी।

विकलांगों की मदद का सपना

shooter vishal goyal dehradun

विशाल कहते हैं कि पिता सुरेश कुमार गोयल ने जिस तरह उन्हें कभी खुद को कम न समझने की सीख दी। उसी तरह वह भी विकलांगों का सहारा बनना चाहते हैं।

विशाल ने सामाजिक संगठन मानुष प्रेरणा समिति का गठन किया है। यह संस्था फिजिकली और मेंटली चैलेंज लोगों के लिए काम करती है।

एलएलबी और एमएसडब्लू कर चुके विशाल कहते हैं कि इस संस्था के जरिये वह वर्ष 2010 में दिवंगत हो चुके पिता को श्रद्धांजलि भी दे रहे हैं।

उपलब्धियां
- वर्ष 2009 में स्टेट लेवल पर गोल्ड मेडल
- वर्ष 2010 में स्टेट लेवल पर गोल्ड मेडल
- वर्ष 2007, 08, 09 और 2010 में नेशनल चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed