देख नहीं सकते, लेकिन छुड़ाते हैं 'दुश्मन' के छक्के
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ब्लाइंड क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से द्वितीय अंतर्राज्यीय राष्ट्रीय दृष्टिहीन क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन देहरादून में किया जा रहा है।
19 से 22 जून तक दून स्कूल में होने वाले टूर्नामेंट में देशभर से 60 खिलाड़ी प्रतिभाग करने वाले हैं।
बुधवार को हिंदी भवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में एसोसिएशन के महासचिव मानवेंद्र सिंह पटवाल ने बताया कि पिछले साल ही टूर्नामेंट की शुरुआत हुई।
देखकर नहीं बल्कि सुनकर खेला जाता है क्रिकेट
इस बार टूर्नामेंट में महाराष्ट्र, गोवा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और केरल के खिलाड़ी होंगे। उत्तराखंड से 14 खिलाड़ी खेल रहे हैं।
बताया कि यह अनूठा टूर्नामेंट हैं, जिसमें खेल देखकर नहीं बल्कि सुनकर खेला जाता है। खिलाड़ियों को तीन भागों में विभाजित किया गया है।
बी-1 श्रेणी में पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित खिलाड़ी हैं। बी-2 श्रेणी में दो मीटर तक साफ देखने वाले खिलाड़ी और बी-3 श्रेणी में तीन से छह मीटर तक साफ देखने वाले खिलाड़ी लिए गए हैं।
इस मौके पर सुधीर अग्रवाल, आशीष सिंह नेगी, शाहिद रजा, अमनदीप आर्य, आशीष सिंह नेगी आदि उपस्थित रहे।
दून में बनती है बॉल
राजपुर रोड स्थित राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थान (एनआईवीएच) के स्पोर्ट टीचर एमएल मिश्रा ने बताया कि दृष्टिहीनों के क्रिकेट के लिए बॉल संस्थान में ही तैयार की जाती है।
लंबे शोध के बाद वर्ष 1987 में पहली बार 85 ग्राम की सामान्य बाल के भीतर तीन मिमी की छोटी स्टील बाल रखकर यह गेंद तैयार की गई थी। यह गेंद फेंके जाने पर आवाज करती है।
बताया कि बॉल बनने के बाद वर्ष 1990 में दिल्ली में पहला दृष्टिहीन क्रिकेट टूर्नामेंट हुआ।
बॉल की खासियत यह भी है कि यह सिर्फ घुटने तक ही उछल सकती है। बताया कि संस्थान में बॉल में बदलाव पर शोध जारी है।
अब ऐसी बॉल बनाने की कोशिश की जा रही है जो अधिक ऊंचाई तक उछल सके। इससे दृष्टिहीन भी सामान्य खिलाड़ियों की तरह क्रिकेट खेल पाएंगे।