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जीत ने कम कर दी हार की टीस: मीर रंजन नेगी
अंशुल डांगी / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 04 Oct 2014 11:21 AM IST
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‘गुरुवार को एशियन गेम्स में हाकी के फाइनल में 32 साल बाद भारत और पाकिस्तान की टीमें एक बार फिर आमने-सामने थीं। लेकिन, इस बार टीम ने वह चूक नहीं की जो तब हुई थी।
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गोलकीपर को ठहराया गया था हार का जिम्मेदार
तब हार का जिम्मेदार गोलकीपर को ठहराया गया था और आज मैच के हीरो गोलकीपर श्रीजेश ही बने। यह क्षण मेरे लिए बहुत भावुक था।’ भारतीय हाकी टीम के पूर्व गोलकीपर मीर रंजन नेगी ने एशियन गेम्स में भारतीय टीम की जीत के बाद ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में अपने दिल की बात साझा की।
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मीर रंजन नेगी ने कहा कि आज के मैच में भी टीम दबाव में थी और 1982 में भी ऐसी ही स्थिति थी। तब एशियन गेम्स का आयोजन दिल्ली में हुआ था और घरेलू मैदान पर जीत का दबाव टीम को ले डूबा था। देश की कई हस्तियां इस मैच को देखने पहुंची थीं।
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हम पाकिस्तान से 7-1 से हारे थे, लेकिन इसका सारा कसूर उनपर (गोलकीपर) डाल दिया गया था। जैसे गोलकीपर और पाकिस्तान के बीच ही मैच हो। मीर रंजन नेगी बताते हैं कि वे लंबे समय तक इस हार का कलंक झेलते रहे। बाद में उन्होंने भारतीय टीम के गोलकीपिंग कोच के रूप में खुद को साबित किया।
उनके कोच रहते 1998 में टीम ने एशियन गेम्स में गोल्ड जीता था। तब गोलकीपर आशीष जीत के हीरो बने थे। गुरुवार को भारतीय टीम पर ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने का दबाव था। टीम शुरू में दबाव में खेली और गोल भी खाया। मगर बाद में वापसी की और जीत शानदार रही।
उन्होंने जीत के लिए हॉकी इंडिया लीग को भी श्रेय दिया है। उनका कहना है कि इस फार्मेट के बाद हाकी का स्वरूप ही बदल गया है। इसमें बेहद तेजी की जरूरत होती है और इस लीग का असर भारतीय टीम के खेल में भी नजर आ रहा है।
हाकी में भविष्य के लिए शुभ संकेत
जिला खेल अधिकारी और हाकी खिलाड़ी सतीश कुमार सार्की ने एशियन गेम्स की जीत को भविष्य के लिए शुभ संकेत बताया। हॉकी में सबसे ज्यादा बोलबाला यूरोपियन देशों का रहता है, लेकिन अब भारतीय टीम भी यूरोपीय तकनीकि अपनाने लगी है।
जीत अच्छी, लेकिन सुधार की जरूरत
पूर्व ओलंपियन हाकी खिलाड़ी हरदयाल सिंह ने जीत पर टीम को बधाई दी है, लेकिन उन्होंने कहा कि अभी सुधार की गुंजाइश है।
उन्होंने पेनाल्टी शूट आउट में खिलाड़ियों का घूमना और गोल करने के लिए नजदीक जाने की तकनीकि को बदलने पर जोर दिया। आस्ट्रेलिया, जर्मनी, हॉलैंड की टीमें विपक्षी टीम की इन्हीं कमजोरियां का फायदा उठाती हैं।