फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   disabled player of dehradun.

बुलंद इरादों के आगे हारी अपंगता

Mon, 27 Oct 2014 12:48 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 27 Oct 2014 12:48 PM IST
विज्ञापन
disabled player of dehradun.

इरादे बुलंद हों तो कामयाबी की राह में कोई बाधा नहीं आ सकती। कुदरत ने भले ही विकलांगता का दंश दिया हो, लेकिन दून के कुछ युवाओं ने अपनी कमी को ही हथियार बना लक्ष्य साधने का तरीका सीख लिया है।

विज्ञापन


राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल कर रहे ये युवा अपने जैसे ही नहीं, सामान्य युवाओं के लिए भी मिसाल बनकर उभरे हैं। रविवार को पर्वतीय विकलांग सेवा संस्थान ने ऐसे ही कुछ युवाओं को सम्मानित किया।
विज्ञापन


दिलराज का निशाना अचूक

हाथीबड़कला निवासी दिलराज कौर का बायां हाथ और शरीर का बायां हिस्सा पैदाइशी काम नहीं करता। लेकिन निशक्त होने के बावजूद दिलराज अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


व्हील चेयर पर बैठकर बंदूक उठाने वाली दिलराज का निशाना कभी चूकता नहीं। वर्ष 2007 में उन्होंने ताइवान में गोल्ड और वर्ष 2009 में रजत पदक जीता था।

पोलियो को हरा पैरों पर खड़े हुए चंचल

लक्खीबाग निवासी चंचल को दो वर्ष की उम्र में पोलियो हो गया था। इसके चलते वह पैरों पर खड़े नहीं हो सकते, लेकिन चंचल ने कभी खुद को परिवार पर बोझ नहीं बनने दिया।

घर पर बैठे रहने के बजाय चंचल ने हाईस्कूल तक पढ़ाई पूरी की और इसके बाद इलेक्ट्रानिक्स का काम सीख खुद की दुकान शुरू की। इन दिनों वह एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं।

खुदमुख्तार सुंदर ने दूसरों को भी दिया रोजगार
सहसपुर निवासी सुंदर थापा के पैर जन्म से ही मुड़े हुए थे। वह ठीक से चल नहीं सकते, लेकिन यह कमी कभी उनकी राह रोक नहीं सकी। सुंदर ने स्वरोजगार को अपनाया।

घर पर ही डेयरी शुरू की, जहां तीन लोगों को उन्होंने रोजगार भी दिया है। सुंदर बताते हैं कि डेयरी से उन्हें प्रतिमाह 25 हजार की कमाई होती है। यही नहीं, सुंदर अपने गांव के प्रधान भी रह चुके हैं।


हाथ बिना सोने पर निशाना लगाते हैं विशाल

रायपुर रोड निवासी विशाल बचपन में बम को गेंद समझ खेलने लगे थे। बिजनौर में वर्ष 1990 में हुए उस हादसे ने उनके दोनों हाथ छीन लिए।

अब हाथों के नाम पर उनका कंधे से कोहनी तक का हिस्सा ही बचा है। लेकिन विशाल इनकी मदद से ही निशानेबाजी में कामयाबी हासिल कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed