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बारिश से बिगड़ते हालात
नई दिल्ली
Updated Sun, 20 Jul 2014 07:36 PM IST
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उत्तराखंड में पिछले कुछ दिनों से निरंतर हो रही वर्षा से जो हालात बन रहे हैं, वे न सिर्फ भयावह हैं, बल्कि इससे पिछले साल की यादें ताजा होने लगी हैं। लगातार बारिश ने इस बीच कई लोगों की जानें ली हैं, तो अनेक जगह मकान ध्वस्त हो गए हैं।
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भूस्खलन से प्रमुख मार्ग समेत छोटी-बड़ी सड़कें बंद हो गई हैं, दुकान-बाजार बंद होने और जरूरी चीजों की आपूर्ति रुकने से जनजीवन पर असर पड़ा है, तो ट्रांसफर्मर फुंकने से जगह-जगह बिजली भी नहीं है। चारधाम यात्रा तो रुक ही गई है, बाहर से आए करीब छह हजार लोग जहां-तहां फंस गए हैं। वर्षा में बदरीनाथ हाई-वे करीब सौ मीटर बह गया है और गंगोत्री-यमुनोत्री समेत तमाम होटल-ढाबों और बाजारों में सन्नाटा पसरा है। स्थानीय लोग क्षुब्ध और हताश हैं, तो तीर्थयात्रियों की मुश्किलें भी समझी जा सकती हैं। वे न सिर्फ यात्रा पूरी नहीं कर पाए, बल्कि प्रतिकूल मौसम में उनकी जेब ढीली हो रही है, और फिलहाल वे घर लौटने की स्थिति में भी नहीं हैं।
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बेशक मानसून की वर्षा पर किसी का जोर नहीं है, लेकिन इस बार की तबाही बहुत कुछ सरकारी लापरवाही का भी नतीजा है। पिछले साल उत्तराखंड में आई भीषण तबाही के बाद अव्वल तो राहत-पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम ही बहुत सुस्त गति से चला। तिस पर सरकार और प्रशासन ने चारधाम यात्रा शुरू करने को जितना महत्व दिया, उतना प्रभावित हुए स्थानीय लोगों के पुनर्वास पर नहीं दिया। पिछले साल बेघर हुए सभी लोगों का पुनर्वास ही अभी नहीं हो पाया है कि बेघर-विस्थापितों की एक छोटी-सी आबादी को छत मुहैया कराने की नई चुनौती अब सरकार के सामने है।
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सड़कों के निर्माण, मलबों के निस्तारण और नदियों के आसपास बसे गांवों को पानी से बचाने की व्यवस्था करने में तब जो सुस्ती और ढिलाई बरती गई, उसका नतीजा अब सामने है। उसी समय कहा जा रहा था कि आनन-फानन में बनाई गई सड़कें एक बारिश भी नहीं झेल पाएंगी, और वही हुआ। बल्कि तमाम नदियों का जलस्तर बढ़ जाने के कारण अब मैदानी इलाकों में बाढ़ के खतरे की आशंका भी बन गई है। अगर पिछले साल की तबाही से कुछ सबक सीखा गया होता, तो इस बारिश का नुकसान कम से कम होता। मुश्किल यह है कि सरकार अगर सक्रिय हो, तो भी इस मूसलाधार वर्षा में वह राहत का काम उस रफ्तार से नहीं चला पाएगी।