{"_id":"3dcd5d58-4b8d-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"world-does-not-end-this-way","type":"story","status":"publish","title_hn":"इस तरह खत्म नहीं होती दुनिया","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
इस तरह खत्म नहीं होती दुनिया
Updated Fri, 21 Dec 2012 10:11 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
तो इस बार भी दुनिया खत्म होने से बच गई! दक्षिणी फ्रांस स्थित बुगाराच की पहाड़ी पर आनन-फानन में शरण लेने वाले अमीर पर्यटक ही नहीं, एशिया महाद्वीप के इस इलाके में हम लोग भी सुरक्षित हैं, और 21 दिसंबर की तारीख निकल जाने के कारण निश्चिंत भी। यह नहीं कह सकते कि सृष्टि के अंत की भविष्यवाणी करने वाले कापालिकों को अफसोस हो रहा होगा, क्योंकि पृथ्वी के बचे होने से वे भी बच गए हैं!
विज्ञापन
हां, इस तरह की अफवाहों का भयादोहन करने वाला वर्ग जरूर कुछ मुनाफा कमा ले गया है। पृथ्वी के खत्म हो जाने की भविष्यवाणियां नई नहीं हैं। कभी कोई अष्टग्रही, कभी कोई नास्त्रेदमस, कभी कोई स्काई लैब, तो कभी कोई माया कैलेंडर हमारे खत्म हो जाने का दावा करता है, लेकिन हर बार वह विज्ञान के सामने हार मानने को विवश होता है। हम भूल जाते हैं कि पृथ्वी माया कैलेंडर के भरोसे नहीं, अपनी घू्र्णन गति के कारण चलती है।
विज्ञापन
हम अक्सर यह भी भूल जाते हैं कि अंतरिक्ष में तैनात जो उपग्रह भूकंप, परमाणु परीक्षण और दूसरे अनिष्टों की सूचना दे सकते हैं, वे उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने के खतरे के बारे में भी बता सकते हैं। आखिर इससे पहले एकाधिक बार पृथ्वी को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं को वैज्ञानिकों ने बेअसर किया ही है। जिस दौर में जीवों के क्लोन बन चुके हैं, गुणसूत्रों के नक्शे के बारे में पता कर लिया गया है और गॉड पार्टिकल की खोज कर ली गई है, उस समय धूमकेतु की टक्कर, महाज्वालामुखी के विस्फोट या ब्लैकहोल के प्रकट होने से ब्रह्मांड के खत्म हो जाने की कल्पना कर लेना विज्ञान को नकारना ही है।
विज्ञापन
सृष्टि का खत्म होना बेशक कपोल कल्पना नहीं है; करीब साढ़े सोलह करोड़ साल पहले ऐसे एक ध्वंस में डायनासोर खत्म हुए ही थे। पर विज्ञान ऐसी आशंका को खारिज करता है। इसके उलट पर्यावरणीय विनाश से पृथ्वी के खत्म हो जाने की जो आशंका बनी है, उस पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। बेहिसाब उपभोग के कारण वनस्पतियों और जीवों की असंख्य प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं, ओजोन परत का छेद बड़ा होता जा रहा है, ग्लोबल वार्मिंग भयावह रूप लेती जा रही है, और कई बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं। अगर पर्यावरण को नहीं बचाया गया, तो दुनिया को खत्म होने से तो नहीं ही रोका जा सकेगा, तब पहाड़ी की किसी चोटी पर या पाताल में निर्मित आधुनिकतम कक्ष में शरण लेकर भी हम बच नहीं पाएंगे।