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ओबामा के साथ
नई दिल्ली
Updated Thu, 22 Jan 2015 08:12 PM IST
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द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से चार महीने का वक्त काफी नहीं होता, लेकिन पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में नई गर्माहट आई है। गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री के बुलावे पर भारत आ रहे बराक ओबामा की यात्रा को इस सिलसिले की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा सकता है।
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हालांकि अमेरिका की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से देखें, तो ओबामा इतने कमजोर पहले कभी नहीं रहे और यह माना जा रहा है कि संसद के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत खो देने के बाद से उनके हाथ में कुछ खास बचा भी नहीं है। इसके बावजूद द्विपक्षीय संबंधों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। बराक ओबामा भारत के गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे। उनके इस प्रवास का सिर्फ सांकेतिक महत्व नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच बड़े समझौतों और सहमतियों के लिए अच्छा अवसर भी है।
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वास्तव में दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु समझौता अब तक व्यावहारिक नहीं हो सका है। यह समझौता भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से अहम है, तो अमेरिकी परमाणु कंपनियों के लिए कारोबार के लिहाज से भी। यदि उनके प्रवास के दौरान समझौते के उत्तरदायित्व वाले प्रावधान पर सहमति बन जाती है, तो वाकई यह बड़ी उपलब्धि होगी। इसके अलावा भारत को जहां 'मेक इन इंडिया' जैसे कार्यक्रम के लिए निवेश की जरूरत है, वहीं अमेरिका को अपना निर्यात बढ़ाना है और भारत उसके लिए एक माकूल बाजार साबित हो सकता है।
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मगर हकीकत यह भी है कि दोनों देशों के बीच पिछले एक दशक में द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर सौ अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन अमेरिका और चीन के करीब 580 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार की तुलना में यह अब भी बहुत कम है। इसके अलावा आतंकवाद के मोर्चे पर भी दोनों देशों के बीच काफी बातें होती रही हैं और जानकारियों का आदान-प्रदान भी हो रहा है, पर पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवाद भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है।
बेशक ओबामा ने अमेरिकी कांग्रेस के अपने सालाना संबोधन में पेरिस से लेकर पाकिस्तान तक में फैले आतंकवाद से लड़ने का संकल्प लिया है, लेकिन जब तक जमात उद दावा और लश्कर जैसे संगठनों की नकेल नहीं कसी जाती, तब तक ऐसे संकल्प बेमानी ही साबित होंगे।