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तो अब खेती ही खत्म करेंगे!

Mon, 24 Sep 2012 01:49 PM IST
Updated Mon, 24 Sep 2012 01:49 PM IST
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will agriculture end so

नई अर्थनीति के पैरोकार अब खेती के पारंपरिक तरीके को ही खत्म करने की जैसी वकालत कर रहे हैं, वह स्तब्ध करता है। प्रधानमंत्री के जन सूचना ढांचे और नवप्रवर्तन मामलों के सलाहकार सैम पित्रोदा लगातार कह रहे हैं कि हमें अब खेती बहुमंजिली इमारतों में करनी चाहिए! सैम पित्रोदा देश में दूरसंचार क्रांति के सूत्रधारों में से रहे हैं, और ज्ञान आयोग में रहते हुए भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं।

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लेकिन इस तरह का सुझाव देते हुए क्या वह हमारी खेती और अर्थव्यवस्था में उसके महत्व को सचमुच समझ रहे हैं! जहां कृषि शौक के बजाय जीवन-यापन का जरिया है, जहां खेती का मतलब धूल, मिट्टी और कीचड़ में सने रहना है, वहां बहुमंजिली इमारतों में कांच की दीवारों के बीच अत्याधुनिक सिंचाई सुविधाओं के जरिये खेती करने का सुझाव देना अव्यावहारिक ही नहीं, अज्ञानता का भी सूचक है। यह वैसा ही है, जैसे राजधानी के वातानुकूलित कमरे में बैठकर कोई यह मान ले कि देश के सभी गांवों तक बिजली पहुंच गई है और वहां टेलीविजन, कंप्यूटर और इंटरनेट चौबीसों घंटे काम करते हैं।
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जिन विकसित देशों ने इस तरह की खेती शुरू की है, उनकी अर्थव्यवस्थाओं में कृषि उतनी महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती। जबकि अपने देश में मोहभंग के बावजूद न सिर्फ आधी से अधिक आबादी खेती पर निर्भर है, बल्कि मुश्किलों के समय यही अर्थव्यवस्था को उबारने का काम भी करती है। वर्टिकल फार्मिंग या हाइड्रोपोनिक्स दरअसल उन अमीर देशों के लिए मुफीद है, जहां खेती जरूरत नहीं, बल्कि शौक है, और जो अपनी खाद्य जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। जबकि हमारे देश की बड़ी आबादी गरीब है, जो आयातित महंगा अनाज नहीं खरीद सकती।
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वर्टिकल फार्मिंग का मतलब खेती को अमीरों के हवाले करना भी होगा। फिर वे गरीब किसान कहां जाएंगे, जिनके लिए जमीन का एक छोटा टुकड़ा भी महत्व रखता है? हाल के वर्षों में हम विकसित देशों की तरह कंगाल नहीं हुए, तो इसके पीछे हमारी पारंपरिक खेती का भी योगदान है। वैसे ही नई आर्थिक नीतियों के तहत खेती को निशाना बनाया जा रहा है। अब अगर विकसित देशों की तर्ज पर हमारे यहां कृषि के महत्व को ही कम करने की बात सोची जा रही है, तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं होगा।

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