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विकिलीक्स के निशाने पर

Tue, 09 Apr 2013 09:30 PM IST
Updated Tue, 09 Apr 2013 09:30 PM IST
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wikileaks on rajiv gandhi

यह जरूर कुछ चौंकाने वाला है कि भारत से जुड़े विकिलीक्स के ताजा खुलासे लोकसभा चुनाव की तैयारियों से ठीक पहले तब आए हैं, जब कांग्रेस राहुल गांधी को सुनियोजित तरीके से स्थापित करने में जुटी है।

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इसमें वैसे तो कई जानकारियां हैं, लेकिन बोफोर्स से भी पहले एक स्वीडिश कंपनी के युद्धक विमान की खरीद में बिचौलिये के रूप में राजीव गांधी का नाम सबसे हैरत में डालने वाला है।
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इतालवी युद्धक विमानों की हालिया खरीद में बिचौलिये के रूप में अगर एक पूर्व वायुसेना प्रमुख के नजदीकियों की लिप्तता बताई गई है, तो करीब साढ़े तीन दशक पहले भी फ्रांस के युद्धक विमानों की खरीद में बिचौलिये के रूप में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख के दामाद का नाम आना बताता है कि रक्षा सौदे की प्रक्रिया में कुछ नहीं बदला है।
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राजीव गांधी से जुड़ा रहस्योद्घाटन अपने यहां विपक्षी पार्टियों के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार भले हो, लेकिन इसे बहुत अहमियत देने का मतलब नहीं है। एक तो इसलिए कि खुद राजीव गांधी अपने पर लगे इस आरोप का जवाब देने के लिए नहीं हैं।

दूसरा यह कि जॉर्ज फर्नांडीज और कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेताओं द्वारा आपातकाल में अमेरिका से मदद मांगने का खुलासा उससे कम सनसनीखेज नहीं है। फिर भी लगता नहीं कि इसका आनेवाले चुनावों में कोई असर होगा।

फिर विकिलीक्स के खुलासे बेशक झूठ न हों, तब भी इनसे दुनिया में कहीं भी राजनीतिक अस्थिरता नहीं आई है, न ही ये चुनावी नतीजों को प्रभावित कर पाए हैं।

दरअसल यह उस दौर के भारत की सच्चाई है, जब इंदिरा गांधी आपातकाल लागू कर चुकी थीं और समूचा राजनीतिक विपक्ष उनके निशाने पर था।

लेकिन ये खुलासे उस अमेरिका के बारे में भी बताते हैं, जो शीतयुद्ध के उस दौर में अपना पलड़ा मजबूत करने के लिए तमाम देशों से जुड़ी गोपनीय जानकारियां इकट्ठा करने में भी नहीं हिचकता था।


इसलिए भारत में वामपंथी रुझान वाले युवा कांग्रेस के अध्यक्ष को हटाए जाने का ब्योरा भी उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

विकिलीक्स के ये खुलासे अगर हमारी राजनीतिक पार्टियों के लिए हैरान करने वाले हैं, तो ओबामा के उस अमेरिका के लिए भी बहुत असहज करने वाले होंगे, जो आज भारत को शीतयुद्ध के आईने में रखकर नहीं देख सकता।

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