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यह तसवीर बदलते क्यों नहीं

Thu, 08 Nov 2012 09:16 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 08 Nov 2012 09:16 PM IST
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why do not change this picture

यह विचित्र ही है कि विश्व आर्थिक मंच के जिस भारतीय संस्करण में हमारी अर्थव्यवस्था की संभावनाओं के बारे में बातचीत होनी थी, उसमें सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल ज्यादा उठे। बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज ने जिस तरह कहा कि वह पिछले कई दशकों से अपने कारोबार को सरकारी लेन-देन के दायरे से बाहर रखते आए हैं, वह देश की आर्थिक गतिविधियों में व्याप्त भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का ही सूचक है। कई दूसरे उद्योग घरानों का भी लहजा बताता है कि सरकार उनका विश्वास जीतने में विफल रही है।

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जाहिर है, केवल उदार आर्थिक नीतियों की घोषणा भर से काम नहीं चलने वाला, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जरूरी माहौल भी बनाना होगा, जिसका फिलहाल तो अभाव ही दिखता है। एक के बाद एक घोटाले के खुलासे तो सामने आते हैं, लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था को दंडित करने की कोई तैयारी नहीं दिखाई देती। ऐसे में उद्योग घराने अगर मान बैठे हों कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सुनहरे दिन खत्म हो चुके हैं, तो यह सरकार के लिए गहन चिंता का विषय होना चाहिए। लेकिन फिलहाल अपना घर ठीक करने के बजाय वह आरोप लगाने वालों पर गुस्सा उतारती दिखाई देती है।
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नियंत्रक और महालेखा परीक्षक विनोद राय ने, इसी मंच से, फैसले लेने में सरकार की बेशर्मी को भयावह बताया, तो मंत्रियों को यह आपत्तिजनक लगा। जबकि हाल में इसी सरकार को सलमान खुर्शीद मामले में चुप्पी बरतते और हरियाणा में जमीनों की खरीद में हेराफेरी के मामले में रॉबर्ट वाड्रा को क्लीन चिट देते देखा गया है। भ्रष्टाचार के खुलासों पर ही यह सरकार जिस तरह सवाल उठाने लगती है, उसी से उसके रवैये पर शक होता है।
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विनोद राय भी कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार खत्म करना है, तो सीबीआई और सीवीसी को सरकारी कठपुतली बनाए रखने के बजाय सांविधानिक दरजा देना होगा। बिना इसके प्रस्तावित लोकपाल भी बखूबी काम नहीं कर पाएगा। यह अचानक नहीं है कि ठीक इसी समय सर्वोच्च न्यायालय ने भी सीबीआई में खाली पड़े पदों को देखते हुए भ्रष्टाचार से निपटने के मामले में सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाया है। लिहाजा दूसरों पर गुस्सा उतारने के बजाय सरकार अगर अपनी कमियां देख उन्हें दूर करने की सोचे, तो वह ज्यादा अच्छा होगा।

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