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महंगाई की सुध किसे है

Tue, 17 Dec 2013 07:43 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 17 Dec 2013 07:43 PM IST
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who is thinking about inflation
थोड़े दिनों पहले तक जो लोग समझ रहे थे कि रिजर्व बैंक में रघुराम राजन की नियुक्ति भर से चीजें बेहतर हो जाएंगी, अब वे भी महसूस कर रहे होंगे कि महज मौद्रिक नीतियों के उलटफेर से अर्थव्यवस्था को गति नहीं दी सकती। बल्कि लगातार दो बार रेपो दर में बढ़ोतरी के बाद आज की आर्थिक समीक्षा में इसमें फिर बढ़ोतरी की आशंका ने रिजर्व बैंक के मौजूदा गवर्नर को भी अपने उस पूर्ववर्ती की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया है, जो लगातार ब्याज दर बढ़ाने के कारण ही चर्चा में थे।
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यह बार-बार कहा जाता रहा है कि महंगाई कम करने का काम केंद्रीय बैंक का नहीं, बल्कि सरकारों का है। लेकिन चुनावी राजनीति के इस व्यस्त मौसम में आर्थिक मामलों की अनदेखी करने का नतीजा यह है कि खाद्य पदार्थों के दाम तेजी से बढ़ने के कारण थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति पिछले चौदह महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई।
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और इसमें महंगे ईंधन के अलावा हरी सब्जियों की तेजी ने बड़ी भूमिका निभाई है। बढ़ी आवक के कारण नवंबर के महीने में सब्जियों की कीमत अमूमन कम रहती है, लेकिन पिछले महीने आलू, प्याज और टमाटर की बढ़ी कीमतों से सब्जियों के दाम करीब 95 फीसदी तक बढ़े हुए रहे!
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आंकड़े बताते हैं कि खाद्य पदार्थों में इतनी महंगाई पिछले साढ़े तीन साल में नहीं देखी गई। यह सर्वविदित है कि चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के पीछे महंगाई एक बड़ी वजह रही है; बाजारों में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने और जमाखोरी रोकने में संप्रग सरकार बुरी तरह विफल साबित हुई है। विडंबना यह है कि लोकसभा चुनाव सामने होने के कारण मुद्रास्फीति का मौजूदा आंकड़ा भी केंद्र सरकार को शायद ही उतना चिंतित करे, महंगाई रोकने के उपाय करने की तो बात ही छोड़ दें।


मुद्रास्फीति इसी तरह ऊंची बनी रही, तो इससे मध्यवर्ग तो परेशान रहेगा ही, बढ़ी हुई ब्याज दर अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन माने-जाने वाले उद्योग-धंधों के लिए भी नकारात्मक साबित होगी। शेयर बाजार पर इसका असर दिखने ही लगा है। हाल के दिनों में आयात कम हुआ है, निर्यात बढ़े हैं और रुपया भी मजबूती की ओर है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार की निष्क्रियता इन सब पर पानी फेर देगी।
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