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जब चुप्पी असहनीय हो जाए

Wed, 17 Sep 2014 08:13 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 17 Sep 2014 08:13 PM IST
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When silence becomes unbearable

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस साल की शुरुआत में, एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था, उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ उनका मूल्यांकन करेगा। पर यूपीए के दूसरे कार्यकाल में विवादों के बीच निरंतर मौन धारण कर और सत्ता से बाहर होने पर हमलों के बीच लगातार चुप्पी बरतकर उन्होंने विरोधियों की जितनी आलोचना और समर्थकों का जितना क्षोभ मोल लिया है, उतना शायद ही कभी किसी और राजनेता के खाते में आया होगा।

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इतिहास मनमोहन सिंह का कैसा मूल्यांकन करता है, यह तो नहीं मालूम, मगर वर्तमान ने उनके प्रति जैसी निर्ममता दिखाई है, वह आधुनिक भारतीय राजनीति में अभूतपूर्व है। अलबत्ता मनमोहन सिंह के प्रति बरती जा रही इस निर्ममता के पीछे खुद उनकी चुप्पी भी कम जिम्मेदार नहीं है। सत्ता से बाहर होने के बाद संजय बारू और पी सी परख ने अपनी किताबों में पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में जो कथित खुलासे किए, उनसे उनकी एक कमजोर छवि बनती थी, जो अपने विभाग में अपनी पसंद का अधिकारी नहीं रख सकता और कोयला मंत्रालय में सुधार के प्रयासों को पलीता लगते चुपचाप देखता रहता है। कायदे से तब मनमोहन सिंह को चुप्पी तोड़नी चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं तोड़ी।
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पर अब पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक विनोद राय ने अपनी किताब में 2 जी घोटाले का जिक्र करते हुए उनके बारे में जो खुलासे किए हैं, वे तो बेहद चौंकाने वाले हैं। विनोद राय का कहना है कि तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में प्रधानमंत्री को सारी जानकारियों से अवगत कराते रहते थे। विनोद राय ने यह तक दावा किया है कि 2 जी मामले में मनमोहन सिंह का नाम हटाने के लिए तीन कांग्रेसी नेता उनसे मिले थे।
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मानो यही रहस्योद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री को असहज करने के लिए कम न हों, पूर्व केंद्रीय मंत्री कमल नाथ का भी कहना है कि 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटालों के बारे में आगाह करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी थी, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह के मौन का अर्थ समझ में आता था, क्योंकि उन पर सरकार की गुरुतर जिम्मेदारी थी और कोई भी असावधान प्रतिक्रिया सरकार को असहज कर सकती थी। लेकिन अब उनकी चुप्पी इसलिए खलती है, क्योंकि उनकी वह ईमानदारी सवालों के घेरे में है, जो उनके व्यक्तित्व की पूंजी है।

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